दो साल तक खिंच रही दिवालिया मामलों की सुनवाई

Update: 2026-07-20 14:18 GMT

नई दिल्ली। देश में फंसे हुए कर्ज (NPA) की समस्या से निपटने के लिए बनाए गए दिवालिया एवं बैंक्रप्सी कोड (IBC) को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। दिवालिया कानून के तहत कर्ज वसूली की दर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। संसद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से दिए गए आंकड़ों के अनुसार, IBC के शुरुआती वर्षों में जहां कर्जदाताओं को कुल बकाये का करीब 54 से 55 प्रतिशत तक पैसा वापस मिल रहा था, वहीं अब यह दर घटकर करीब 20 प्रतिशत तक पहुंच गई है। दूसरी ओर, मामलों के निपटारे में लगने वाला समय भी लगातार बढ़ रहा है और औसतन 744 दिन तक पहुंच गया है।

वित्त मंत्री ने लोकसभा में लिखित जवाब में बताया कि सरकार अभी भी IBC को अपने उद्देश्यों में सफल मानती है। हालांकि, कर्ज वसूली की घटती दर और समाधान प्रक्रिया में बढ़ता समय वित्तीय क्षेत्र के लिए चिंता का विषय बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि कानून बनने के बाद शुरुआत में इसका असर काफी प्रभावी रहा था, लेकिन समय के साथ लंबित मामलों, कानूनी विवादों और परिसंपत्तियों की कम कीमत मिलने जैसी समस्याओं के कारण रिकवरी में गिरावट आई है।

शुरुआत में 54 फीसदी तक हुई थी वसूली

दिवालिया एवं बैंक्रप्सी कोड को वर्ष 2016 में लागू किया गया था। इसका उद्देश्य था कि कर्ज में डूबी कंपनियों का जल्दी समाधान किया जाए और बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थानों को उनका पैसा वापस मिल सके। IBC लागू होने के समय भारतीय बैंकिंग सेक्टर भारी मात्रा में फंसे हुए कर्ज की समस्या से जूझ रहा था।

शुरुआती वर्षों में इस कानून के तहत कर्ज वसूली की स्थिति काफी बेहतर रही। वर्ष 2017-18 में IBC के तहत केवल 18 मामलों का समाधान हुआ था और इनसे 3,807 करोड़ रुपये की वसूली हुई थी। यह कुल बकाये कर्ज का लगभग 54 प्रतिशत था। इससे उम्मीद जगी थी कि दिवालिया कानून बैंकिंग सेक्टर के लिए बड़ा सुधार साबित होगा।

लेकिन बाद के वर्षों में जैसे-जैसे मामलों की संख्या बढ़ी, वैसे-वैसे रिकवरी प्रतिशत में गिरावट आने लगी। वित्त मंत्री के अनुसार, वर्ष 2025-26 में IBC के तहत 233 मामलों का समाधान हुआ और इनसे 42,003 करोड़ रुपये की वसूली हुई। यह कुल बकाये का सिर्फ 20 प्रतिशत रहा।

पिछले साल भी रिकवरी में आई थी कमी

आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में IBC के तहत 259 मामलों का निपटारा हुआ था। इन मामलों में कुल 54,604 करोड़ रुपये की वसूली हुई थी, जो कुल बकाये का करीब 37 प्रतिशत थी। यानी एक साल के भीतर ही रिकवरी प्रतिशत में बड़ी गिरावट देखने को मिली।

बैंकिंग विशेषज्ञों का कहना है कि कई बड़े मामलों में परिसंपत्तियों की कीमत कम मिलने, खरीदारों की कमी और लंबी कानूनी प्रक्रिया के कारण कर्जदाताओं को अपेक्षित राशि नहीं मिल पा रही है। इसके अलावा कई मामलों में समाधान प्रक्रिया शुरू होने के बाद भी मुकदमेबाजी जारी रहती है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ जाते हैं।

180 दिन में समाधान का नियम, लेकिन लग रहे 2 साल से ज्यादा

IBC कानून में किसी भी मामले को 180 दिनों के भीतर निपटाने का प्रावधान है। जरूरत पड़ने पर इसमें 90 दिनों का अतिरिक्त समय दिया जा सकता है। यानी सामान्य परिस्थितियों में किसी मामले का समाधान अधिकतम 270 दिनों के भीतर होना चाहिए।

लेकिन वास्तविक स्थिति इससे काफी अलग है। वित्त मंत्री के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025-26 में IBC मामलों के समाधान में औसतन 744 दिन लगे। यह निर्धारित समय सीमा से लगभग तीन गुना अधिक है। इससे पहले वर्ष 2024-25 में औसत समाधान अवधि 713 दिन थी।

लंबे समय तक चलने वाली प्रक्रिया के कारण कंपनियों की परिसंपत्तियों का मूल्य घटता जाता है और कर्जदाताओं को मिलने वाली राशि कम हो जाती है। यही वजह है कि IBC के तहत रिकवरी प्रतिशत लगातार गिरता दिखाई दे रहा है।

सरकार मान रही है IBC को सफल

हालांकि गिरती रिकवरी दर और बढ़ते समाधान समय के बावजूद केंद्र सरकार का कहना है कि IBC ने भारतीय वित्तीय व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया है। सरकार के अनुसार, इस कानून ने बैंकों को खराब कर्ज से निपटने का एक मजबूत ढांचा दिया है और डिफॉल्टर कंपनियों पर दबाव बढ़ाया है।

सरकार का मानना है कि IBC के कारण कर्ज चुकाने की संस्कृति में सुधार आया है और कंपनियों के प्रमोटरों पर जिम्मेदारी बढ़ी है। पहले जहां कर्ज नहीं चुकाने के बाद भी कंपनियों के मालिकों के पास कई विकल्प होते थे, वहीं अब दिवालिया प्रक्रिया के कारण उन पर कार्रवाई जल्दी होती है।

रिकवरी सुधारना बनी बड़ी चुनौती

हालांकि आने वाले समय में IBC के सामने सबसे बड़ी चुनौती कर्ज वसूली दर को सुधारना और मामलों के निपटारे में लगने वाले समय को कम करना है। बैंकों और निवेशकों की नजर अब इस बात पर है कि सरकार और नियामक किस तरह से प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लंबित मामलों को जल्द निपटाया जाए, कानूनी अड़चनों को कम किया जाए और परिसंपत्तियों की बेहतर कीमत सुनिश्चित की जाए तो IBC फिर से प्रभावी साबित हो सकता है। फिलहाल, कर्ज वसूली में गिरावट और बढ़ते समाधान समय ने दिवालिया कानून की कार्यप्रणाली को लेकर नई बहस शुरू कर दी है।

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