नई दिल्ली। सोने और चांदी की कीमतों में एक बार फिर बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। हाल के ऊंचे स्तरों के बाद कीमती धातुओं पर बिकवाली का दबाव बढ़ा है। सोना डेढ़ लाख रुपये के महत्वपूर्ण स्तर के करीब पहुंच गया है, जबकि चांदी की कीमत में करीब 4,400 रुपये की बड़ी गिरावट की बात सामने आई है। बाजार की नजर अब 16 सितंबर को होने वाले महत्वपूर्ण फैसले पर टिकी है। इसके पहले निवेशक सतर्क दिखाई दे रहे हैं और मुनाफावसूली के कारण सोने-चांदी की कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
कीमती धातुओं में पिछले कुछ समय से तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। रिकॉर्ड या ऊंचे स्तरों पर पहुंचने के बाद सोने में मुनाफावसूली बढ़ने से भाव नीचे आए हैं। बाजार के लिए डेढ़ लाख रुपये का स्तर अब मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अगर बिकवाली का दबाव जारी रहता है तो कीमत इस स्तर के नीचे भी जा सकती है। हालांकि आगे की चाल वैश्विक संकेतों, डॉलर, ब्याज दरों और निवेशकों के रुख पर निर्भर करेगी।
चांदी में गिरावट सोने के मुकाबले ज्यादा तेज दिखाई दी है। चांदी के भाव में करीब 4,400 रुपये की गिरावट ने कारोबारियों और निवेशकों का ध्यान खींचा है। चांदी आम तौर पर सोने के मुकाबले ज्यादा अस्थिर मानी जाती है। इसकी कीमतों पर निवेश मांग के साथ औद्योगिक मांग का भी असर पड़ता है। यही वजह है कि बाजार में धारणा बदलने पर चांदी में तेजी या गिरावट अपेक्षाकृत ज्यादा हो सकती है।
फिलहाल निवेशकों की सबसे बड़ी नजर 16 सितंबर से जुड़े फैसले पर है। किसी बड़े आर्थिक या मौद्रिक नीति संबंधी फैसले से पहले बाजार में सतर्कता बढ़ना सामान्य बात है। ब्याज दरों और भविष्य की मौद्रिक नीति को लेकर संकेत सोने और चांदी जैसी गैर-ब्याज देने वाली संपत्तियों की मांग को प्रभावित कर सकते हैं।
सोने की कीमतों पर वैश्विक ब्याज दरों का बड़ा असर पड़ता है। जब ब्याज दरें ऊंची रहने की संभावना बढ़ती है तो निवेशकों के लिए बॉन्ड और दूसरी ब्याज देने वाली संपत्तियां ज्यादा आकर्षक हो सकती हैं। इसके विपरीत ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद बढ़ने पर सोने को समर्थन मिल सकता है। यही कारण है कि केंद्रीय बैंकों के फैसलों और उनके बयानों पर सर्राफा बाजार की नजर रहती है।
अमेरिकी डॉलर की चाल भी सोने के लिए महत्वपूर्ण होती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत मुख्य रूप से डॉलर में तय होती है। डॉलर मजबूत होने पर दूसरे देशों के खरीदारों के लिए सोना महंगा हो सकता है, जिससे मांग पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर डॉलर कमजोर पड़ने पर सोने को समर्थन मिलने की संभावना रहती है।
भारत में सोने की कीमत तय होने में अंतरराष्ट्रीय भाव के अलावा रुपये और डॉलर की विनिमय दर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना गिरता है लेकिन रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो जाता है तो घरेलू बाजार में गिरावट सीमित रह सकती है। इसके विपरीत अंतरराष्ट्रीय सोने में कमजोरी और रुपये में मजबूती एक साथ होने पर घरेलू कीमतों पर ज्यादा दबाव दिखाई दे सकता है।
सोने में मौजूदा कमजोरी को मुनाफावसूली से भी जोड़कर देखा जा रहा है। किसी भी संपत्ति में तेज तेजी के बाद निवेशक अपना लाभ सुरक्षित करने के लिए बिकवाली कर सकते हैं। अगर बड़ी संख्या में कारोबारी एक साथ मुनाफा काटते हैं तो कीमतों में तेजी से गिरावट आ सकती है। सोने और चांदी में भी ऐसी परिस्थितियां समय-समय पर देखने को मिलती हैं।
चांदी का मामला थोड़ा अलग है। इसका इस्तेमाल आभूषण और निवेश के अलावा औद्योगिक क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर ऊर्जा और विभिन्न औद्योगिक उत्पादों में चांदी की मांग रहती है। इसलिए वैश्विक अर्थव्यवस्था और औद्योगिक गतिविधियों के अनुमान में बदलाव भी इसके भाव पर असर डाल सकता है।
चांदी में करीब 4,400 रुपये की गिरावट देखने के बाद निवेशकों के बीच सवाल है कि क्या यह खरीदारी का मौका है या कीमतों में और गिरावट आ सकती है। इसका निश्चित जवाब देना संभव नहीं है। कमोडिटी बाजार में कीमतें कई वैश्विक और घरेलू कारकों से प्रभावित होती हैं। केवल एक दिन की बड़ी गिरावट देखकर निवेश का फैसला करना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
त्योहारी सीजन के कारण भारतीय बाजार में सोने और चांदी की मांग पर भी नजर रहेगी। आने वाले समय में आभूषणों और कीमती धातुओं की खुदरा खरीद बढ़ सकती है। भारत में त्योहारों और शादी के सीजन के दौरान सोने की मांग परंपरागत रूप से महत्वपूर्ण रहती है। यदि कीमतों में बड़ी गिरावट आती है तो कुछ खरीदार इसे खरीदारी के अवसर के रूप में देख सकते हैं।
हालांकि ऊंचे भाव खुदरा मांग को सीमित भी कर सकते हैं। कीमतें ऐतिहासिक रूप से काफी ऊंचे स्तर पर होने की स्थिति में ग्राहक कम वजन के आभूषण या सीमित खरीदारी का विकल्प चुन सकते हैं। ऐसे में त्योहारों की मांग और ऊंची कीमतों के बीच संतुलन घरेलू सर्राफा बाजार की दिशा तय करने में अहम रहेगा।
ज्वेलरी खरीदने वालों के लिए यह समझना जरूरी है कि बाजार में बताए जाने वाले सोने के भाव और दुकान पर चुकाई जाने वाली अंतिम कीमत अलग हो सकती है। सोने की शुद्धता, जीएसटी, मेकिंग चार्ज और अन्य लागू शुल्क के कारण आभूषण की अंतिम कीमत बढ़ जाती है। इसलिए केवल बाजार भाव देखकर ज्वेलरी की कुल लागत का अनुमान नहीं लगाना चाहिए।
इसी तरह सोने के अलग-अलग कैरेट के भाव में अंतर होता है। 24 कैरेट सोना अधिक शुद्ध होता है, जबकि आभूषण बनाने में आम तौर पर दूसरी शुद्धताओं का भी इस्तेमाल होता है। खरीदारी करते समय हॉलमार्क और शुद्धता की जानकारी जांचना महत्वपूर्ण है।
निवेश के नजरिए से भी सोने में उतार-चढ़ाव को समझना जरूरी है। सोने को अक्सर पोर्टफोलियो में विविधता लाने और अनिश्चित परिस्थितियों में जोखिम संतुलित करने वाली संपत्ति के रूप में देखा जाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इसकी कीमत हमेशा बढ़ती ही रहेगी। छोटी अवधि में सोने में भी बड़ी गिरावट संभव है।
वहीं चांदी में अस्थिरता और ज्यादा हो सकती है। तेजी के दौर में यह सोने से ज्यादा बढ़ सकती है तो बिकवाली के समय गिरावट भी तेज हो सकती है। इसलिए कम अवधि के लिए कारोबार करने वालों के लिए जोखिम प्रबंधन महत्वपूर्ण हो जाता है।
अब बाजार की नजर 16 सितंबर के घटनाक्रम पर रहेगी। फैसले के साथ-साथ उसके बाद मिलने वाले संकेत भी महत्वपूर्ण होंगे। बाजार अक्सर केवल तत्काल निर्णय पर प्रतिक्रिया नहीं देता बल्कि भविष्य में ब्याज दरों और आर्थिक नीति की दिशा को लेकर दिए गए संकेतों को भी कीमतों में शामिल करता है।
अगर फैसले के बाद ब्याज दरों में नरमी की उम्मीद मजबूत होती है तो सोने को दोबारा समर्थन मिल सकता है। दूसरी ओर अगर लंबे समय तक सख्त मौद्रिक नीति जारी रहने के संकेत मिलते हैं तो कीमती धातुओं पर दबाव बना रह सकता है। डॉलर और बॉन्ड यील्ड की प्रतिक्रिया भी सोने-चांदी की अगली दिशा के लिए महत्वपूर्ण होगी।
फिलहाल सोना डेढ़ लाख रुपये के स्तर के आसपास होने और चांदी में करीब 4,400 रुपये की गिरावट की खबर ने बाजार में हलचल बढ़ा दी है। निवेशकों के लिए आने वाले कारोबारी सत्र महत्वपूर्ण रहने वाले हैं।
सोने और चांदी में मौजूदा गिरावट के बीच जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय वास्तविक बाजार भाव, कॉन्ट्रैक्ट, शुद्धता और अपने निवेश उद्देश्य को ध्यान में रखना जरूरी है। 16 सितंबर के फैसले के बाद बाजार की दिशा ज्यादा स्पष्ट हो सकती है। तब तक कीमती धातुओं में तेज उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
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