नई दिल्ली। शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड में निवेश करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। निवेश से अच्छा मुनाफा मिलने के साथ ही एक महत्वपूर्ण सवाल भी सामने आता है कि इस कमाई पर कितना टैक्स देना होगा। खासकर अगर किसी निवेशक को एक वित्त वर्ष में शेयर या म्यूचुअल फंड बेचकर ₹3 लाख का मुनाफा हुआ है तो पूरी रकम पर टैक्स लगेगा या केवल उसके एक हिस्से पर? इसका जवाब निवेश की अवधि और निवेश के प्रकार पर निर्भर करता है।
शेयर और इक्विटी म्यूचुअल फंड से होने वाले लाभ को सामान्य तौर पर कैपिटल गेन माना जाता है। इसे दो हिस्सों में बांटा जाता है—शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन यानी STCG और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन यानी LTCG। दोनों पर टैक्स की दर अलग होती है। यहां उदाहरण सूचीबद्ध इक्विटी शेयर और ऐसे इक्विटी-ओरिएंटेड म्यूचुअल फंड का है, जिन पर संबंधित कैपिटल गेन नियम लागू होते हैं।
कब माना जाता है लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन?
यदि सूचीबद्ध शेयर या पात्र इक्विटी म्यूचुअल फंड यूनिट को 12 महीने से अधिक समय तक रखने के बाद बेचा जाता है तो उससे होने वाला लाभ आम तौर पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन माना जाता है।
मौजूदा नियमों के तहत ऐसे LTCG में एक वित्त वर्ष के दौरान ₹1.25 लाख तक के लाभ पर टैक्स छूट उपलब्ध है। इस सीमा से ज्यादा के पात्र लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन पर 12.5 प्रतिशत की दर से टैक्स लगता है।
मान लीजिए किसी व्यक्ति को एक वित्त वर्ष में शेयर बेचने से कुल ₹3 लाख का लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन हुआ। इसमें से पहले ₹1.25 लाख छूट की सीमा में आएंगे। इसके बाद ₹1.75 लाख टैक्स योग्य बचेंगे।
₹1.75 लाख का 12.5 प्रतिशत निकालें तो टैक्स ₹21,875 बनता है। इसके ऊपर लागू 4 प्रतिशत हेल्थ एंड एजुकेशन सेस जोड़ने पर कुल देनदारी लगभग ₹22,750 हो सकती है। हालांकि वास्तविक टैक्स व्यक्ति की कुल आय और अन्य लागू प्रावधानों के आधार पर अलग हो सकता है।
शॉर्ट टर्म में कितना टैक्स?
यदि सूचीबद्ध इक्विटी शेयर या पात्र इक्विटी म्यूचुअल फंड को खरीदने के 12 महीने के भीतर बेचकर मुनाफा कमाया जाता है और संबंधित शर्तें पूरी होती हैं, तो यह शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन माना जाता है।
ऐसे पात्र STCG पर वर्तमान में 20 प्रतिशत की विशेष टैक्स दर लागू होती है। इसमें LTCG जैसी ₹1.25 लाख की सालाना छूट नहीं मिलती।
उदाहरण के लिए यदि किसी निवेशक ने कम समय में शेयर खरीदकर बेच दिए और उसे ₹3 लाख का शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन हुआ तो सामान्य गणना के मुताबिक ₹3 लाख का 20 प्रतिशत यानी ₹60,000 टैक्स बनेगा। इस पर 4 प्रतिशत सेस जोड़ने के बाद यह करीब ₹62,400 हो सकता है।
हालांकि कम कुल आय वाले व्यक्ति के मामले में बेसिक एग्जेम्प्शन लिमिट से जुड़े नियम टैक्स की अंतिम गणना को प्रभावित कर सकते हैं।
म्यूचुअल फंड में सभी स्कीमों के नियम एक जैसे नहीं
यह समझना बेहद जरूरी है कि हर म्यूचुअल फंड पर शेयर जैसा टैक्स नहीं लगता। इक्विटी-ओरिएंटेड म्यूचुअल फंड और डेट या अन्य प्रकार के म्यूचुअल फंड की टैक्स व्यवस्था अलग हो सकती है।
इक्विटी-ओरिएंटेड फंड के लिए पात्रता इस बात पर निर्भर करती है कि फंड निर्धारित अनुपात में घरेलू कंपनियों की इक्विटी में निवेश करता है या नहीं। दूसरी ओर डेट म्यूचुअल फंड और कुछ अन्य योजनाओं में यूनिट खरीदने की तारीख और फंड की संरचना के आधार पर टैक्स नियम बदल सकते हैं।
इसलिए केवल यह देखकर टैक्स तय नहीं किया जा सकता कि निवेश 'म्यूचुअल फंड' में है। पहले यह जानना जरूरी है कि वह इक्विटी फंड है, डेट फंड है या किसी दूसरी कैटेगरी की स्कीम।
₹3 लाख का मुनाफा यानी ₹3 लाख की बिक्री नहीं
नए निवेशकों के बीच एक आम भ्रम यह भी है कि शेयर बेचने पर खाते में आई पूरी रकम पर टैक्स लगता है। ऐसा नहीं है। कैपिटल गेन की गणना सामान्यतः बिक्री मूल्य और निवेश की लागत के अंतर तथा लागू समायोजनों के आधार पर होती है।
मान लीजिए आपने ₹5 लाख में शेयर खरीदे और बाद में उन्हें ₹8 लाख में बेच दिया। इसका अर्थ यह नहीं कि ₹8 लाख पर टैक्स देना है। सामान्य उदाहरण में आपका लाभ ₹3 लाख होगा और टैक्स की गणना इसी कैपिटल गेन पर संबंधित नियमों के अनुसार होगी।
ब्रोकरेज स्टेटमेंट और कैपिटल गेन रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनमें खरीद और बिक्री से जुड़ी जानकारी मिलती है।
इंट्राडे और F&O के नियम अलग
अगर कोई व्यक्ति शेयर खरीदकर उसी दिन बेच देता है यानी इंट्राडे ट्रेडिंग करता है तो उसकी टैक्स व्यवस्था डिलीवरी आधारित शेयर निवेश से अलग हो सकती है। इंट्राडे इक्विटी ट्रेडिंग से होने वाली आय को आम तौर पर स्पेकुलेटिव बिजनेस इनकम माना जाता है।
वहीं फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस यानी F&O से होने वाली आय को आम तौर पर नॉन-स्पेकुलेटिव बिजनेस इनकम के रूप में देखा जाता है। ऐसे मामलों में टैक्स स्लैब के साथ कारोबार से जुड़े रिकॉर्ड, खर्च, टर्नओवर और कुछ परिस्थितियों में टैक्स ऑडिट जैसे नियम भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
इसलिए STCG के 20 प्रतिशत वाले नियम को हर तरह की शेयर ट्रेडिंग पर लागू मानना गलत होगा।
डिविडेंड पर भी देना पड़ सकता है टैक्स
शेयर और म्यूचुअल फंड से केवल कैपिटल गेन ही आय का जरिया नहीं है। कंपनियां निवेशकों को डिविडेंड भी देती हैं। डिविडेंड की आय सामान्यतः निवेशक की कुल आय में शामिल होती है और लागू आयकर व्यवस्था के अनुसार उस पर टैक्स लग सकता है।
कुछ मामलों में डिविडेंड भुगतान पर TDS से जुड़े नियम भी लागू होते हैं। इसलिए इनकम टैक्स रिटर्न भरते समय डिविडेंड आय को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
ITR भरते समय रखें इन बातों का ध्यान
निवेशक को वित्त वर्ष के दौरान किए गए निवेश और बिक्री का पूरा रिकॉर्ड रखना चाहिए। ब्रोकर की कैपिटल गेन रिपोर्ट, म्यूचुअल फंड स्टेटमेंट, बैंक रिकॉर्ड और टैक्स से जुड़े दस्तावेज ITR भरते समय काम आते हैं।
यह भी ध्यान रखें कि केवल डीमैट खाते से पैसे बैंक में निकालने पर टैक्स नहीं लगता। टैक्स का सवाल आम तौर पर तब पैदा होता है जब निवेश बेचकर वास्तविक लाभ अर्जित किया जाता है।
इसलिए अगर आपको शेयर या पात्र इक्विटी म्यूचुअल फंड से ₹3 लाख का मुनाफा हुआ है तो सबसे पहले यह देखना होगा कि वह लॉन्ग टर्म है या शॉर्ट टर्म। सामान्य उदाहरण में ₹3 लाख के पात्र LTCG पर ₹1.25 लाख की छूट के बाद ₹1.75 लाख पर 12.5 प्रतिशत टैक्स बन सकता है, जबकि पात्र STCG में ₹3 लाख पर 20 प्रतिशत की दर लागू हो सकती है।
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