WUC ने उइगर बच्चों के अधिकार और चीन की नीतियों पर जताई चिंता

Munich : वर्ल्ड उइघुर कांग्रेस (WUC) ने अपनी हालिया साप्ताहिक ब्रीफिंग में उइघुर लोगों के अधिकारों से जुड़ी कई घटनाओं पर प्रकाश डाला है। इनमें संयुक्त राष्ट्र की 'बाल अधिकार समिति' (CRC) को रिपोर्ट सौंपना, चीन के नए लागू 'जातीय एकता कानून' का विरोध, जर्मनी से चीन में एक उइघुर शरणार्थी का डिपोर्टेशन (वापसी), और तानाशाही शासन में सरकारी दमन की जांच पर नई एकेडमिक रिसर्च शामिल हैं।
WUC की साप्ताहिक ब्रीफिंग के अनुसार, 20 जुलाई 2026 को WUC और 'उइघुर सेंटर फॉर डेमोक्रेसी एंड ह्यूमन राइट्स' (UZDM) ने संयुक्त रूप से संयुक्त राष्ट्र की 'बाल अधिकार समिति' को एक रिपोर्ट सौंपी। यह रिपोर्ट समिति द्वारा चीन की आगामी समीक्षा से पहले दी गई है। इसका मकसद समिति के 'प्री-सेशन वर्किंग ग्रुप' को जानकारी देना है, जिसकी बैठक 29 सितंबर से 2 अक्टूबर 2026 के बीच होनी है।
WUC की साप्ताहिक ब्रीफिंग में बताया गया है कि यह रिपोर्ट 'बाल अधिकार कन्वेंशन' के ढांचे के तहत उइघुर बच्चों की स्थिति की जांच करती है। इसमें आरोप लगाया गया है कि चीनी अधिकारी सुनियोजित तरीके से उइघुर बच्चों को उनके परिवारों से अलग कर रहे हैं, उन्हें सरकारी बोर्डिंग स्कूलों में रख रहे हैं और परिवार से उनके संपर्क को काफी सीमित कर रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप उइघुर भाषा, संस्कृति और पहचान खत्म हो रही है।
रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि माता-पिता और रिश्तेदारों को हिरासत में लेना, बच्चों के लिए "चरमपंथी" माने जाने वाले इस्लामी नामों पर रोक लगाना और 18 साल से कम उम्र के लोगों के लिए धार्मिक रीति-रिवाजों को अपराध की श्रेणी में डालना, इन सबने उइघुर पहचान को दबाने में भूमिका निभाई है। WUC के अनुसार, कल्याणकारी संस्थानों और बोर्डिंग स्कूलों का इस्तेमाल उइघुर बच्चों को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) और उसकी विचारधारा के प्रति वफादार बनाने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए किया जा रहा है।
साप्ताहिक ब्रीफिंग में यह भी बताया गया कि 21 जुलाई को WUC ने 50 से अधिक उइघुर संगठनों के समर्थन से एक संयुक्त बयान जारी किया। इसमें चीन के 'जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाले कानून' की निंदा की गई, जो 1 जुलाई 2026 को लागू हुआ था।
WUC द्वारा बताए गए बयान के अनुसार, यह कानून चीनी राष्ट्र की अवधारणा को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के बराबर मानकर जबरन आत्मसात (assimilation) करने का एक जरिया है। इन संगठनों का तर्क है कि कानून के तहत, उइघुर, तिब्बती, मंगोलियाई और अन्य गैर-हान जातीय पहचानों को केवल तभी तक बने रहने की अनुमति है जब तक कि वे पार्टी द्वारा तय की गई एक ही राष्ट्रीय पहचान में मिल न जाएं।
WUC ने कानून के आर्टिकल 63 पर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि यह आर्टिकल देश की सीमाओं के बाहर भी अधिकार क्षेत्र (extraterritorial jurisdiction) तय करता है और विदेशों में रहने वाले उइघुर, तिब्बती, मंगोलियाई और चीनी असंतुष्टों को निशाना बनाने वाली अंतरराष्ट्रीय दमन की नीति को औपचारिक रूप देता है। संयुक्त बयान में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से 'जातीय एकता और प्रगति कानून' (Ethnic Unity and Progress Law) को रद्द करने की दिशा में सार्थक कदम उठाने का आग्रह किया गया।
साप्ताहिक ब्रीफ में जर्मनी से चीन भेजे गए उइघुर शरणार्थी अराफात आदिल के हालिया निर्वासन का भी जिक्र किया गया। WUC के अनुसार, आदिल ने जर्मनी में शरण मांगी थी। संगठन ने जर्मन अधिकारियों से उसे तुर्की भेजने का आग्रह किया था, जहां उसकी मां रहती हैं, लेकिन इसके बावजूद उसे फ्रैंकफर्ट से बीजिंग भेज दिया गया।
WUC के मुताबिक, आदिल 22 जुलाई को बीजिंग पहुंचा, जहां खबरों के अनुसार चीनी अधिकारियों ने उसे हिरासत में ले लिया और उससे पूछताछ की। बाद में वह 23 जुलाई को इस्तांबुल जाने में सफल रहा।
वर्ल्ड उइघुर कांग्रेस और सोसाइटी फॉर थ्रेटन्ड पीपल्स ने इस निर्वासन की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा कि किसी उइघुर को चीन वापस भेजने का मतलब है उसे उत्पीड़न के गंभीर जोखिम में डालना, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक जानकारी है कि उइघुर लोगों के खिलाफ नरसंहार चल रहा है।
साप्ताहिक ब्रीफ में डॉ. एड्रियन ज़ेंज़ के हाल ही में प्रकाशित एकेडमिक रिसर्च पर भी प्रकाश डाला गया। इसमें 'इन्वेस्टिगेटिव पॉलिसी एनालिसिस' (IPA) को पेश किया गया है, जो एक रिसर्च मैथडोलॉजी है। इसे बहुत अधिक प्रतिबंधात्मक और सत्तावादी माहौल में छिपी हुई सरकारी नीतियों का पता लगाने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
WUC के अनुसार, पीयर-रिव्यू की गई यह स्टडी बताती है कि कैसे रिसर्चर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों, खरीद रिकॉर्ड, नियमों और अन्य आधिकारिक नौकरशाही सबूतों का विश्लेषण करके छिपी हुई सरकारी नीतियों का पता लगा सकते हैं। यह विशेष रूप से उन स्थितियों में उपयोगी है जहां प्रभावित क्षेत्रों तक सीधी पहुंच संभव नहीं है।
WUC ने बताया कि यह मैथडोलॉजी उन रिसर्च तरीकों पर आधारित है जिनका इस्तेमाल पहले चीन में उइघुर लोगों के खिलाफ बड़े पैमाने पर नजरबंदी, जबरन श्रम, परिवार से अलगाव और जन्म-रोकथाम नीतियों के आरोपों को दर्ज करने के लिए किया गया था। संगठन ने कहा कि यह फ्रेमवर्क रिसर्चर को बंद और सत्तावादी समाजों में मानवाधिकारों के कथित उल्लंघन की जांच करने के लिए एक नया टूल देता है।





