
वर्ल्ड | यरूशलम में ऑस्कर विजेता फलस्तीनी फिल्म निर्देशक बेसान समीर पर यहूदी प्रवासियों ने हमला कर दिया। इस हमले के बाद स्थानीय पुलिस ने उन्हें ही गिरफ्तार कर लिया, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाराजगी बढ़ गई है। कई मानवाधिकार संगठनों और फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने इस कार्रवाई की कड़ी आलोचना की है।
कैसे हुआ हमला?
जानकारी के मुताबिक, बेसान समीर यरूशलम में अपने फिल्म प्रोजेक्ट से जुड़े कार्यों में व्यस्त थे, जब उन पर कट्टरपंथी यहूदी प्रवासियों ने हमला कर दिया। चश्मदीदों के अनुसार, हमलावरों ने निर्देशक को घेर लिया और उन पर नस्लीय टिप्पणियां करते हुए मारपीट की।
स्थानीय निवासियों के अनुसार, यह हमला अचानक नहीं था, बल्कि पहले से योजनाबद्ध था। हमलावरों का आरोप था कि समीर "इसराइल विरोधी प्रचार" कर रहे थे, जबकि निर्देशक का कहना है कि वह केवल अपनी फिल्म पर काम कर रहे थे।
पुलिस की कार्रवाई और विवाद
हमले के तुरंत बाद मौके पर पहुंची इसराइली पुलिस ने हमलावरों को पकड़ने के बजाय समीर को ही गिरफ्तार कर लिया। पुलिस का कहना है कि उन्हें "सार्वजनिक व्यवस्था भंग करने" के आरोप में हिरासत में लिया गया। हालांकि, इस फैसले की भारी आलोचना हो रही है।
फिल्म जगत और मानवाधिकार संगठनों ने पुलिस की कार्रवाई को अन्यायपूर्ण बताते हुए इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला करार दिया।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
यह घटना ऐसे समय हुई है जब इसराइल-फलस्तीन विवाद पहले से ही गहराया हुआ है।
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संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने समीर की गिरफ्तारी पर चिंता जताई और इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की।
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हॉलीवुड और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समुदाय ने भी इस घटना की निंदा की है। कई कलाकारों और निर्देशकों ने इसे "कलात्मक स्वतंत्रता पर हमला" बताया।
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अरब लीग और कई मध्यपूर्वी देशों ने इस घटना पर विरोध दर्ज कराया है और इसे फलस्तीनियों के खिलाफ बढ़ते अत्याचार का हिस्सा बताया है।
इसराइल-फलस्तीन विवाद की पृष्ठभूमि में बढ़ता तनाव
यरूशलम में इस तरह की घटनाएं नई नहीं हैं। हाल के वर्षों में इसराइली सुरक्षाबलों और फलस्तीनी नागरिकों के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। इस हमले को भी उसी संघर्ष की एक कड़ी के रूप में देखा जा रहा है, जहां फलस्तीनी नागरिकों और कलाकारों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है।
फिलहाल, बेसान समीर की रिहाई को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ी जा रही है। लेकिन यह घटना एक बार फिर इसराइल-फलस्तीन संघर्ष में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के मुद्दे को केंद्र में ले आई है।





