
ढाका। भारत और बांग्लादेश के बीच करीब तीन दशक पुरानी गंगा जल संधि इस साल समाप्त होने वाली है। दिसंबर में इसकी अवधि खत्म होने से पहले दोनों देशों के अधिकारियों ने इसे आगे बढ़ाने को लेकर शुरुआती बातचीत शुरू कर दी है। इसी बीच बांग्लादेश में प्रस्तावित गंगा बैराज परियोजना को लेकर पर्यावरण समूहों और विशेषज्ञों ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि बांग्लादेश को गंगा बैराज परियोजना पर आगे बढ़ते समय भारत के फरक्का बैराज से जुड़े अनुभवों से सीख लेनी चाहिए। उनका तर्क है कि बड़ी जल परियोजनाओं में पारदर्शिता, स्थानीय परिस्थितियों और लंबे समय के पर्यावरणीय प्रभावों की अनदेखी भविष्य में बड़ी समस्याएं पैदा कर सकती है।
एशियन ग्रोथ रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर नजरुल इस्लाम और अमेरिका की कॉमनवेल्थ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर खलेकुज्जमां ने एक लेख में इस मुद्दे को उठाया है। उन्होंने बताया कि बांग्लादेश एनवायरनमेंट नेटवर्क और बांग्लादेश परिबेश आंदोलन ने गंगा बैराज परियोजना को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं।
इन संगठनों का कहना है कि परियोजना से संबंधित व्यवहार्यता अध्ययन और तकनीकी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जानी चाहिए। उनका दावा है कि बार-बार मांग किए जाने के बावजूद बांग्लादेश जल विकास बोर्ड ने परियोजना से जुड़ी पूरी रिपोर्ट साझा नहीं की है।
पर्यावरण संगठनों ने यह भी सवाल उठाया है कि यदि परियोजना से जुड़ी जानकारी पारदर्शी तरीके से सामने नहीं आती है तो इसका असर गंगा जल बंटवारे को लेकर भारत और बांग्लादेश के बीच चल रही बातचीत पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों ने फरक्का बैराज का उदाहरण देते हुए कहा कि किसी भी बड़े बैराज के निर्माण से पहले नदी के प्राकृतिक प्रवाह, गाद, पारिस्थितिकी और आसपास रहने वाले लोगों की आजीविका पर पड़ने वाले प्रभावों का विस्तृत अध्ययन जरूरी है।
दोनों विशेषज्ञों ने विदेशी सलाहकारों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि केवल विदेशी विशेषज्ञों की मौजूदगी को परियोजना की सफलता की गारंटी नहीं माना जा सकता। स्थानीय भूगोल, नदी व्यवस्था और सामाजिक परिस्थितियों को समझने वाले विशेषज्ञों और इंजीनियरों की राय भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
गंगा बैराज को लेकर उठ रही यह बहस ऐसे समय में तेज हुई है जब भारत और बांग्लादेश गंगा जल संधि के भविष्य पर बातचीत की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में आने वाले महीनों में जल बंटवारे और प्रस्तावित बैराज परियोजना दोनों मुद्दे द्विपक्षीय चर्चा में महत्वपूर्ण बने रह सकते हैं।





