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ताइवान के एयरस्पेस विवाद पर अमेरिका में उठे सवाल

Ratna Netam
4 Oct 2026 3:50 PM IST
ताइवान के एयरस्पेस विवाद पर अमेरिका में उठे सवाल
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वॉशिंगटन। ताइवान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की चीन की कोशिशों को लेकर अमेरिकी सीनेटर टैमी डकवर्थ ने गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर चीन दूसरे देशों पर दबाव डालकर ताइवान के नेताओं की अंतरराष्ट्रीय यात्राओं और उनके विमानों के लिए एयरस्पेस के इस्तेमाल को प्रभावित करता है, तो इससे केवल ताइवान ही नहीं बल्कि वैश्विक विमानन, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और लोगों की आवाजाही पर भी असर पड़ सकता है। डकवर्थ ने इसे एक ऐसी खतरनाक मिसाल बताया है, जिसका भविष्य में व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है।
‘ताइपे टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, डकवर्थ ने अमेरिकी सीनेट की विदेश संबंध समिति की नॉमिनेशन सुनवाई के दौरान यह मुद्दा उठाया। सुनवाई में उन्होंने मेडागास्कर और कोमोरोस में अमेरिकी राजदूत पद के लिए नॉमिनेट किए गए मार्क डिलार्ड से चीन की ओर से ताइवान को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिशों को लेकर सवाल किए।डकवर्थ ने सुनवाई के दौरान अप्रैल में हुई एक घटना का जिक्र किया। उनके अनुसार, मेडागास्कर, मॉरिशस और सेशेल्स ने ताइवान के राष्ट्रपति विलियम लाई के विमान को अपने नियंत्रण वाले एयरस्पेस का इस्तेमाल करने की अनुमति वापस ले ली थी। इसके कारण अफ्रीकी देश एस्वातिनी की ओर जा रहे लाई की यात्रा में देरी हुई थी।डकवर्थ ने दावा किया कि इन देशों की ओर से एयरस्पेस इस्तेमाल की अनुमति वापस लेने का फैसला चीन के दबाव में किया गया था। उन्होंने इस घटनाक्रम को ताइवान के खिलाफ बीजिंग की व्यापक कूटनीतिक रणनीति से जोड़ते हुए कहा कि यदि ऐसी कोशिशों का विरोध नहीं किया गया तो भविष्य में दूसरे देशों की अंतरराष्ट्रीय यात्रा और नागरिक विमानन भी इस तरह के राजनीतिक दबाव से प्रभावित हो सकते हैं।
ताइवान के राष्ट्रपति विलियम लाई की एस्वातिनी यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि एस्वातिनी उन देशों में शामिल है, जिनके ताइवान के साथ आधिकारिक राजनयिक संबंध हैं। चीन लंबे समय से उन देशों पर दबाव बनाता रहा है जो ताइवान के साथ औपचारिक संबंध बनाए रखते हैं। बीजिंग ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और दूसरे देशों द्वारा ताइपे के साथ आधिकारिक स्तर पर संपर्क किए जाने का विरोध करता है।वहीं, ताइवान अपनी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय भागीदारी को बनाए रखने पर जोर देता रहा है। ताइपे के प्रतिनिधि और नेता विभिन्न देशों की यात्रा करते रहे हैं। ऐसे दौरों को लेकर चीन कई बार संबंधित देशों के सामने आपत्ति दर्ज करा चुका है।
अमेरिकी सीनेटर डकवर्थ की चिंता का मुख्य केंद्र विमानन क्षेत्र है। उनका कहना है कि किसी देश की राजनीतिक मांग के आधार पर तीसरे देशों के एयरस्पेस के इस्तेमाल को प्रभावित किया जाना एक गंभीर मुद्दा है। अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के संचालन में कई देशों के हवाई क्षेत्र से गुजरना पड़ता है। ऐसे में यदि राजनीतिक दबाव के आधार पर विमानों के मार्ग में अचानक बदलाव होने लगें, तो इसका असर उड़ानों की योजना, लागत और यात्रा के समय पर पड़ सकता है।यह मामला अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। दुनिया का एक बड़ा हिस्सा हवाई और समुद्री मार्गों के जरिए होने वाले व्यापार पर निर्भर है। विमानन मार्गों में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ने पर यात्रियों के साथ-साथ माल ढुलाई भी प्रभावित हो सकती है। डकवर्थ का कहना है कि इसी कारण ताइवान से जुड़ा यह मुद्दा सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं है।
सुनवाई के दौरान उन्होंने राजदूत पद के लिए नामित मार्क डिलार्ड से यह जानने की कोशिश की कि ऐसी परिस्थितियों में अमेरिकी कूटनीति की क्या भूमिका हो सकती है। खास तौर पर हिंद महासागर और अफ्रीकी क्षेत्र के देशों में चीन का प्रभाव बढ़ने के बीच अमेरिका भी वहां अपने कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने पर जोर देता रहा है।मेडागास्कर, मॉरिशस और सेशेल्स हिंद महासागर में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। वैश्विक समुद्री और हवाई संपर्क के लिहाज से इन देशों की भौगोलिक स्थिति अहम मानी जाती है। यही वजह है कि इस क्षेत्र में चीन, अमेरिका और अन्य प्रमुख शक्तियों की गतिविधियों पर लगातार नजर रहती है।
ताइवान का मुद्दा अमेरिका और चीन के संबंधों में भी लंबे समय से संवेदनशील विषय बना हुआ है। अमेरिका ताइवान के साथ अनौपचारिक संबंध बनाए रखता है और ताइवान जलडमरूमध्य में शांति तथा स्थिरता बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर देता रहा है। दूसरी ओर चीन ताइवान से जुड़े मामलों को अपने आंतरिक मामलों का हिस्सा बताता है और बाहरी हस्तक्षेप का विरोध करता है।
इस पूरे विवाद में अब एयरस्पेस और अंतरराष्ट्रीय विमानन से जुड़ा पहलू भी प्रमुखता से सामने आया है। डकवर्थ की चेतावनी का आशय यह है कि यदि किसी शक्तिशाली देश को राजनीतिक दबाव के जरिए दूसरे देशों के हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल को प्रभावित करने की छूट मिलती है, तो भविष्य में ऐसी रणनीति अन्य अंतरराष्ट्रीय विवादों में भी इस्तेमाल की जा सकती है।
फिलहाल यह मामला अमेरिका में कूटनीतिक स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। डकवर्थ के सवालों ने ताइवान को अलग-थलग करने की चीन की कथित रणनीति के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय एयरस्पेस के स्वतंत्र इस्तेमाल को लेकर नई बहस खड़ी कर दी है। आने वाले समय में अमेरिका और संबंधित देशों का इस मुद्दे पर रुख महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि इसका संबंध केवल चीन-ताइवान तनाव से नहीं बल्कि वैश्विक विमानन और अंतरराष्ट्रीय आवाजाही के व्यापक नियमों से भी जोड़ा जा रहा है।

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