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COP31 से पहले भारत ने रखा जलवायु कार्रवाई का संतुलित एजेंडा

Ratna Netam
6 Oct 2026 7:26 PM IST
COP31 से पहले भारत ने रखा जलवायु कार्रवाई का संतुलित एजेंडा
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नाडी। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने मंगलवार को कहा कि COP31 की तैयारी के दौरान दुनिया को जलवायु परिवर्तन से निपटने के तीन प्रमुख स्तंभों—अनुकूलन, शमन और क्रियान्वयन के साधनों—पर समान रूप से ध्यान देना चाहिए। फिजी के नाडी में आयोजित प्री-COP31 बैठक के लीडर्स प्लेनरी को संबोधित करते हुए यादव ने कहा कि टिकाऊ और प्रभावी जलवायु कार्रवाई के लिए केवल उत्सर्जन घटाने पर जोर पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि जलवायु प्रभावों से निपटने की तैयारी और वित्त, तकनीक तथा क्षमता निर्माण जैसे संसाधनों की उपलब्धता भी उतनी ही जरूरी है।
भूपेंद्र यादव UNFCCC की प्री-COP31 बैठकों में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं। यह बैठक ऑस्ट्रेलिया, फिजी और तुवालु की सह-मेजबानी में आयोजित की जा रही है। भारत ने इस मंच पर जलवायु न्याय और समानता के सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा कि सभी देशों पर एक जैसा समाधान लागू नहीं किया जा सकता। यादव ने कहा कि Equity और Common but Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities यानी CBDR-RC के सिद्धांतों को जलवायु कार्रवाई में पूरी तरह लागू किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि विकसित और विकासशील देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारियां, आर्थिक क्षमताएं और विकास संबंधी जरूरतें अलग-अलग हैं। ऐसे में जलवायु कार्रवाई के लिए “वन-साइज-फिट्स-ऑल” दृष्टिकोण टिकाऊ नहीं हो सकता। भारत का कहना है कि विकासशील देशों को अपनी अर्थव्यवस्था और समाज की जरूरतों के अनुसार ऊर्जा परिवर्तन और जलवायु नीति अपनाने की पर्याप्त गुंजाइश मिलनी चाहिए।
यादव ने अपने संबोधन में प्रशांत द्वीप देशों के साथ भारत की दीर्घकालिक साझेदारी का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत स्वास्थ्य और कल्याण, नवीकरणीय ऊर्जा, जलवायु-लचीले बुनियादी ढांचे, पूर्व चेतावनी प्रणालियों, सूचना प्रौद्योगिकी, कृषि और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में प्रशांत देशों के साथ सहयोग करता रहा है और आगे भी यह साझेदारी जारी रहेगी।
प्रशांत द्वीप देश जलवायु परिवर्तन के सबसे गंभीर प्रभावों का सामना कर रहे क्षेत्रों में शामिल हैं। समुद्र का बढ़ता स्तर, तटीय कटाव, चक्रवात और अन्य चरम मौसम घटनाएं इन देशों के लिए अस्तित्व से जुड़ी चुनौती बन चुकी हैं। प्री-COP31 में प्रशांत देशों ने वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने, जलवायु वित्त तक आसान पहुंच और महासागरों को वैश्विक जलवायु नीति के केंद्र में रखने की मांग प्रमुखता से उठाई है।
भारत ने इस संदर्भ में प्रशांत देशों के साथ अपने तटीय लचीलापन और अंतरिक्ष आधारित तकनीकी अनुभव साझा करने की पेशकश भी की है। भूपेंद्र यादव ने कहा कि भारत के पास तटीय क्षेत्रों की निगरानी, आपदा पूर्व चेतावनी और अंतरिक्ष आधारित डेटा के इस्तेमाल से जुड़े ऐसे अनुभव हैं, जिनसे जलवायु जोखिम का सामना कर रहे द्वीपीय देशों को मदद मिल सकती है।
यादव ने इस बात पर जोर दिया कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। विकासशील देशों को वित्त, तकनीक और क्षमता निर्माण के वास्तविक साधन उपलब्ध कराना जरूरी है, ताकि वे अपने जलवायु लक्ष्यों को जमीन पर लागू कर सकें। इसी संदर्भ में उन्होंने “Means of Implementation” को अनुकूलन और शमन के बराबर महत्व देने की बात कही।
जलवायु वित्त प्री-COP31 की चर्चाओं के केंद्र में भी है। फिजी और अन्य प्रशांत देशों ने कहा है कि जलवायु वित्त केवल अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका वास्तविक लाभ उन सरकारों, समुदायों और लोगों तक पहुंचना चाहिए जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना कर रहे हैं।
फिजी में 5 से 8 अक्टूबर तक चल रही प्री-COP31 प्रक्रिया का उद्देश्य नवंबर में होने वाले मुख्य COP31 सम्मेलन से पहले देशों के बीच प्रमुख मुद्दों पर सहमति बनाने और राजनीतिक बातचीत को आगे बढ़ाना है। कार्यक्रम में जलवायु वित्त, ऊर्जा संक्रमण, अनुकूलन, लचीला बुनियादी ढांचा, समुद्री पारिस्थितिकी और नुकसान एवं क्षति जैसे विषयों पर विभिन्न सत्र आयोजित किए जा रहे हैं।
प्रशांत क्षेत्र ने इस बैठक का इस्तेमाल अपनी जलवायु चिंताओं को वैश्विक मंच पर प्रमुखता से रखने के लिए किया है। तुवालु जैसे निचले द्वीपीय देशों में बढ़ता समुद्र स्तर पहले ही गंभीर चिंता पैदा कर रहा है। प्रशांत नेताओं का कहना है कि जलवायु परिवर्तन उनके लिए भविष्य की समस्या नहीं, बल्कि मौजूदा वास्तविकता है।
भूपेंद्र यादव ने भारत की ओर से यह भी संकेत दिया कि वैश्विक जलवायु कार्रवाई तभी प्रभावी होगी जब उसमें न्याय, समानता और देशों की अलग-अलग परिस्थितियों को स्वीकार किया जाए। भारत लंबे समय से यह पक्ष रखता रहा है कि विकासशील देशों को ऊर्जा पहुंच, गरीबी उन्मूलन और आर्थिक विकास के साथ-साथ जलवायु लक्ष्यों को संतुलित करने का अवसर दिया जाना चाहिए।
प्री-COP31 में भारत का संदेश इस बात पर केंद्रित रहा कि जलवायु कार्रवाई को केवल उत्सर्जन कटौती तक सीमित न किया जाए। अनुकूलन, शमन और क्रियान्वयन के साधनों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। साथ ही जलवायु वित्त और तकनीक की उपलब्धता को वैश्विक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए।
फिजी में चल रही यह बैठक COP31 से पहले महत्वपूर्ण कूटनीतिक मंच मानी जा रही है। आने वाले मुख्य सम्मेलन में जलवायु वित्त, अनुकूलन, 1.5 डिग्री लक्ष्य और विकासशील देशों की जरूरतों को लेकर कड़ी बातचीत होने की संभावना है। भारत ने साफ किया है कि वह ऐसी जलवायु व्यवस्था का समर्थन करेगा जिसमें पर्यावरणीय महत्वाकांक्षा के साथ न्याय और विकास संबंधी जरूरतों का भी सम्मान हो।
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