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वैश्विक समुद्री व्यापार में बड़ी भूमिका निभाने की तैयारी में भारत

Ratna Netam
8 Oct 2026 5:44 PM IST
वैश्विक समुद्री व्यापार में बड़ी भूमिका निभाने की तैयारी में भारत
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नई दिल्ली। वैश्विक समुद्री व्यापार में बढ़ती चुनौतियों और बदलते अंतरराष्ट्रीय हालात के बीच भारत अपने समुद्री बुनियादी ढांचे, जहाज निर्माण क्षमता और वैकल्पिक व्यापार मार्गों को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। भू-राजनीतिक तनाव, प्रमुख समुद्री मार्गों पर संभावित रुकावटों और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में बदलाव ने समुद्री व्यापार की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा की हैं। इन्हीं मुद्दों पर चर्चा करने के लिए राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में बुधवार, 7 अक्टूबर से तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 'सागरमंथन: द ग्रेट ओशन्स डायलॉग 2026' की शुरुआत हुई। इस सम्मेलन में दुनिया के 70 से अधिक देशों के प्रतिनिधि समुद्री व्यापार, प्रौद्योगिकी, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श कर रहे हैं।
यह सागरमंथन सम्मेलन का तीसरा संस्करण है, जिसका आयोजन केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय तथा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) संयुक्त रूप से कर रहे हैं। सम्मेलन में करीब 75 देशों के 1,200 से अधिक मंत्री, नीति निर्माता, उद्योग प्रतिनिधि, विशेषज्ञ और शोधकर्ता भाग ले रहे हैं। इस वर्ष सम्मेलन की थीम 'ब्लू जियोग्राफीज, न्यू एस्पिरेशन्स: ट्रेड, टेक्नोलॉजी एंड ट्रस्ट एट सी' रखी गई है। इसका मुख्य उद्देश्य समुद्री क्षेत्र में व्यापार, तकनीकी विकास और आपसी विश्वास को मजबूत करने की संभावनाओं पर चर्चा करना है।
सम्मेलन के पहले दिन वैश्विक समुद्री व्यापार के सामने मौजूद चुनौतियों पर विशेष चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने से समुद्री परिवहन और व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित होने का जोखिम बढ़ गया है। महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर रुकावटें आने की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखला पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन और जहाज निर्माण क्षमता का कुछ देशों में केंद्रित होना भी समुद्री क्षेत्र के सामने बड़ी चुनौतियों में शामिल है।
भारत के लिए ये परिस्थितियां इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि देश अपने बंदरगाहों, जहाज निर्माण उद्योग और समुद्री परिवहन नेटवर्क का विस्तार करने पर जोर दे रहा है। सरकार का उद्देश्य समुद्री व्यापार से जुड़ी सुविधाओं को आधुनिक बनाना और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत की भागीदारी बढ़ाना है। इसके लिए बंदरगाहों की क्षमता, समुद्री संपर्क और जहाज निर्माण क्षेत्र में निवेश को प्राथमिकता दी जा रही है।
केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि भारत का समुद्री क्षेत्र महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुजर रहा है। बंदरगाहों के विकास, जहाज निर्माण क्लस्टरों की स्थापना और समुद्री प्रशिक्षण से संबंधित निवेश इस बदलाव को गति दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत समुद्री क्षेत्र में अपनी क्षमताओं को बढ़ाने के साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी मजबूत करना चाहता है।
सोनोवाल ने कहा कि सागरमंथन ऐसे लोगों को एक मंच पर लाता है, जो समुद्र और महासागरों की ताकत तथा इनके माध्यम से बनने वाले सहयोगपूर्ण संबंधों में विश्वास रखते हैं। उनके अनुसार, समुद्र केवल व्यापार और परिवहन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि विभिन्न देशों, अर्थव्यवस्थाओं और समाजों को जोड़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
केंद्रीय मंत्री ने भारत की समुद्री विकास योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार 'मैरीटाइम इंडिया विजन 2030' और 'मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047' के माध्यम से समुद्री क्षेत्र के दीर्घकालिक विकास पर काम कर रही है। इन योजनाओं का उद्देश्य बंदरगाहों की क्षमता बढ़ाना, जहाज निर्माण को प्रोत्साहित करना, समुद्री संपर्क मजबूत करना और इस क्षेत्र में रोजगार तथा कौशल विकास के अवसरों का विस्तार करना है।
उन्होंने समुद्री क्षेत्र के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। सोनोवाल के अनुसार, भारत के समुद्री कार्यक्रमों का उद्देश्य केवल बुनियादी ढांचे का विकास करना नहीं है, बल्कि ऐसा कुशल कार्यबल तैयार करना भी है, जो भारत के साथ वैश्विक समुद्री अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं को पूरा कर सके।
सम्मेलन में वैकल्पिक समुद्री व्यापार गलियारों के विकास पर भी चर्चा की जा रही है। प्रमुख समुद्री मार्गों पर किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न होने से माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है और आपूर्ति में देरी हो सकती है। ऐसी परिस्थितियों में वैकल्पिक मार्गों का विकास और परिवहन नेटवर्क का विविधीकरण महत्वपूर्ण माना जाता है।
इसके साथ ही वैश्विक जहाज निर्माण क्षमता के कुछ देशों में केंद्रित होने को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई। विशेषज्ञों के अनुसार, जहाज निर्माण की क्षमता सीमित क्षेत्रों में होने से अंतरराष्ट्रीय शिपिंग उद्योग की निर्भरता बढ़ सकती है। ऐसे में विभिन्न देशों में जहाज निर्माण क्षमताओं का विस्तार वैश्विक समुद्री व्यवस्था को अधिक मजबूत बनाने में योगदान दे सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सम्मेलन के लिए भेजे अपने संदेश में स्वतंत्र, सुरक्षित, खुले और नियम आधारित वैश्विक समुद्री व्यवस्था का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि महासागर विभिन्न देशों को जोड़ते हैं और इनके माध्यम से दुनिया में शांति, समृद्धि और विकास के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि समुद्री संसाधनों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों का उपयोग आपसी सहयोग तथा साझा हितों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने भारत के समुद्री क्षेत्र में हुए विकास का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के प्रमुख बंदरगाहों की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। साथ ही जहाजों के बंदरगाहों पर ठहरने की अवधि कम करने और समुद्री परिवहन व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के प्रयास किए गए हैं।
सम्मेलन में समुद्री परिवहन को पर्यावरण के अनुकूल बनाने पर भी जोर दिया गया है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए जहाजों से होने वाले उत्सर्जन को कम करना और स्वच्छ ऊर्जा आधारित तकनीकों को अपनाना महत्वपूर्ण विषय बन गया है। इसके लिए हरित जहाज निर्माण, नए ईंधन विकल्प और आधुनिक तकनीक के उपयोग से जुड़ी संभावनाओं पर चर्चा हो रही है।
सागरमंथन 2026 में समुद्री अर्थव्यवस्था के साथ तटीय समुदायों और उनकी आजीविका से जुड़े मुद्दों को भी स्थान दिया गया है। आयोजकों के अनुसार, सम्मेलन में व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, समुद्री तकनीक, तटीय आजीविका और बंदरगाह शहरों के आर्थिक विकास जैसे विषय शामिल हैं।
यह सम्मेलन 9 अक्टूबर तक चलेगा। इसमें विभिन्न देशों के प्रतिनिधि समुद्री व्यापार के भविष्य, अंतरराष्ट्रीय साझेदारी और समुद्री संसाधनों के टिकाऊ उपयोग से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श करेंगे।
भारत के लिए सागरमंथन 2026 वैश्विक समुद्री क्षेत्र में अपनी विकास योजनाओं और क्षमताओं को प्रस्तुत करने का अवसर है। सरकार बंदरगाहों के आधुनिकीकरण, जहाज निर्माण और समुद्री प्रशिक्षण के जरिए इस क्षेत्र में निवेश तथा सहयोग बढ़ाने का प्रयास कर रही है।
वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और समुद्री व्यापार में अनिश्चितता के बीच इस सम्मेलन का महत्व बढ़ गया है। इसमें भाग लेने वाले देशों के सामने प्रमुख चुनौती ऐसी समुद्री व्यवस्था विकसित करना है, जिसमें व्यापारिक गतिविधियां सुरक्षित रहें, आपूर्ति शृंखला मजबूत बने और तकनीकी विकास के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारियों का भी पालन किया जाए।
सागरमंथन 2026 के माध्यम से भारत ने समुद्री संपर्क, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और दीर्घकालिक समुद्री विकास को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करने का संदेश दिया है। सम्मेलन में होने वाली चर्चाओं से आगे की नीतियों और संभावित साझेदारियों के लिए महत्वपूर्ण सुझाव सामने आ सकते हैं।
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