
वर्ल्ड: पैसों की कमी और लगातार आर्थिक तनाव केवल जीवनशैली और मानसिक शांति को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि इसका असर दिमाग की कार्यक्षमता पर भी पड़ सकता है। एक नई स्टडी में सामने आया है कि लंबे समय तक आर्थिक तंगी झेलने वाले लोगों के दिमाग की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया तेज हो सकती है और उनकी सोचने-समझने की क्षमता कम हो सकती है।
रिसर्च के अनुसार, लगातार पैसों की चिंता दिमाग पर अतिरिक्त दबाव डालती है, जिससे याददाश्त, निर्णय लेने की क्षमता और अन्य संज्ञानात्मक (कॉग्निटिव) कार्य प्रभावित हो सकते हैं। अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों ने जीवन के लंबे समय तक आर्थिक परेशानियों का सामना किया, उनमें मध्यम उम्र तक पहुंचते-पहुंचते दिमाग की कार्यक्षमता में गिरावट देखी गई।
यूनाइटेड किंगडम में की गई इस स्टडी में 2,759 लोगों के स्वास्थ्य और जीवन से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन लोगों ने युवावस्था से लेकर लंबे समय तक कम आय या आर्थिक कठिनाइयों का सामना किया, उनमें 53 साल की उम्र तक सोचने-समझने की क्षमता उन लोगों की तुलना में कम पाई गई, जिन्हें आर्थिक समस्याओं का सामना कम करना पड़ा था।
रिसर्च में यह भी सामने आया कि लंबे समय तक आर्थिक तनाव झेलने वाले लोगों में आगे चलकर दिमाग के सिकुड़ने यानी ब्रेन एट्रोफी का खतरा बढ़ सकता है। अध्ययन के मुताबिक, 71 साल की उम्र तक ऐसे लोगों के दिमाग में संरचनात्मक बदलाव देखने को मिले।
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं का कहना है कि कभी-कभार आने वाली आर्थिक परेशानी की तुलना में वर्षों तक चलने वाली आर्थिक असुरक्षा दिमाग पर ज्यादा गहरा प्रभाव डालती है। लगातार यह चिंता बनी रहती है कि खर्च कैसे पूरे होंगे, परिवार की जरूरतें कैसे पूरी होंगी और भविष्य कैसा होगा। यह मानसिक दबाव दिमाग की ऊर्जा को प्रभावित कर सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, आर्थिक तनाव की स्थिति में इंसान का दिमाग हमेशा समस्याओं को हल करने में व्यस्त रहता है। इससे ध्यान केंद्रित करने, सही निर्णय लेने और नई जानकारी को याद रखने जैसी क्षमताओं पर असर पड़ सकता है। लंबे समय तक ऐसा होने पर दिमाग की कार्यप्रणाली कमजोर हो सकती है।
स्टडी में यह भी पाया गया कि आर्थिक परेशानियों का असर हर व्यक्ति पर समान नहीं होता। पुरुषों, कठिन बचपन वाले लोगों और उन लोगों में इसका प्रभाव ज्यादा देखा गया जिनमें अल्जाइमर जैसी बीमारियों का आनुवंशिक जोखिम मौजूद था।
शोधकर्ताओं ने बताया कि आर्थिक तंगी और मानसिक स्वास्थ्य के बीच गहरा संबंध है। पैसों की समस्या से तनाव, चिंता और नींद की कमी जैसी परेशानियां बढ़ सकती हैं, जो दिमाग के स्वास्थ्य को और प्रभावित कर सकती हैं।
आर्थिक तनाव को नियंत्रित करने से भविष्य में डिमेंशिया जैसी बीमारियों के खतरे को कम करने में मदद मिल सकती है। डिमेंशिया दुनियाभर में तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल है। वर्ष 2019 में दुनिया भर में करीब 5.7 करोड़ लोग इससे प्रभावित थे और अनुमान है कि आने वाले दशकों में इसके मामलों में काफी बढ़ोतरी हो सकती है।
रिसर्चर्स अब ऐसे उपायों पर ध्यान दे रहे हैं, जिनसे आर्थिक तनाव के दिमाग पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सके। इनमें बेहतर आर्थिक सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और जीवनशैली में सुधार जैसे कदम शामिल हैं।
अध्ययन का निष्कर्ष यह बताता है कि आर्थिक स्थिरता केवल बेहतर जीवन जीने के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि यह दिमाग को स्वस्थ रखने में भी अहम भूमिका निभाती है। लंबे समय तक आर्थिक दबाव से बचाव और समय रहते सहायता लेने से उम्र बढ़ने के साथ दिमाग की क्षमता को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।





