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महंगाई के विरोध से शुरू प्रदर्शनों में हिंसा
पेरिस: फ्रांस में आर्थिक परिस्थितियों और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों के हिंसक होने के बीच इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के नेतृत्व पर निशाना साधा है। मंगलवार को एक साक्षात्कार में उन्होंने दावा किया कि फ्रांस को चरमपंथी इस्लाम के आक्रमण का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने फ्रांसीसी नेतृत्व पर समय रहते तैयारी नहीं करने का आरोप लगाया। हालांकि, प्रदर्शनों को चरमपंथी इस्लाम से जोड़ने वाले अपने दावे के समर्थन में उन्होंने कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया।
नेतन्याहू ने कहा कि फ्रांसीसी नेतृत्व अशांति का सामना करने के लिए तैयार नहीं था और उसने परिस्थितियों के आगे समर्पण कर दिया। फ्रांस को सलाह देने संबंधी सवाल पर उन्होंने चरमपंथियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने और तुष्टीकरण से बचने की बात कही। उनकी टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब फ्रांस के कई शहरों में प्रदर्शन, आगजनी और तोड़फोड़ के बाद सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई है। राजधानी पेरिस समेत अन्य स्थानों पर हुए प्रदर्शनों में समाज के विभिन्न वर्गों के लोग शामिल हुए थे।
इजरायली प्रधानमंत्री ने अपने बयान को सात अक्टूबर, 2023 को इजरायल पर हुए हमास के हमले से भी जोड़ा। उन्होंने दावा किया कि उस घटना के बाद उन्होंने मैक्रों को चेतावनी दी थी कि चरमपंथियों को वहां नहीं रोका गया तो पेरिस में भी चुनौती उत्पन्न होगी। यह नेतन्याहू का राजनीतिक आकलन है। उपलब्ध रिपोर्टों में फ्रांस के मौजूदा प्रदर्शनों की शुरुआत महंगाई, स्कूलों की खराब परिस्थितियों और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े असंतोष से बताई गई है।
फ्रांस में सप्ताहांत के दौरान शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बीच कई स्थानों पर हिंसा भड़क गई थी। दुकानों में लूटपाट, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और इमारतों में आग लगाने की घटनाएं सामने आईं। राष्ट्रपति मैक्रों ने हिंसा की निंदा करते हुए कहा कि लोगों की आर्थिक चिंताओं को समझा जा सकता है, लेकिन तोड़फोड़ को स्वीकार नहीं किया जाएगा। सरकार ने हिंसा के लिए अतिवामपंथी समूहों और आपराधिक तत्वों को जिम्मेदार बताया है। इस तरह फ्रांसीसी प्रशासन की व्याख्या नेतन्याहू के दावे से अलग है।
हिंसा के बाद प्रभावित इलाकों में स्थानीय स्तर पर रात्रिकालीन कर्फ्यू लगाया गया। पेरिस, ल्योन और अन्य शहरों में सुरक्षा उपाय बढ़ाए गए हैं। अधिकारियों के अनुसार, लक्षित प्रतिबंधों से कुछ क्षेत्रों में शांति बहाल करने में मदद मिली है। सरकार आगामी प्रदर्शनों को देखते हुए अतिरिक्त पुलिस बल और सैन्य सहयोग की तैयारी कर रही है। प्रशासन के सामने सार्वजनिक व्यवस्था कायम रखने के साथ नागरिकों के प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा करने की चुनौती भी बनी हुई है।
प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने खुफिया जानकारी और पुलिस रणनीति से संबंधित कमियों को स्वीकार किया है। सरकार की कार्रवाई और हिंसा रोकने की तैयारियों पर राजनीतिक सवाल उठ रहे हैं। आगामी विरोध प्रदर्शनों की घोषणाओं के कारण सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हैं। अधिकारियों ने हिंसा में शामिल लोगों की पहचान और गिरफ्तारी की कार्रवाई जारी रखी है। सार्वजनिक इमारतों तथा कारोबारी प्रतिष्ठानों को हुए नुकसान ने संकट के आर्थिक प्रभाव को भी बढ़ाया है।
अशांति के कारणों पर विशेषज्ञों की राय भी सरकारी आरोपों से पूरी तरह मेल नहीं खाती। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, छोटे और असंगठित अतिवामपंथी समूहों को पूरे घटनाक्रम का जिम्मेदार बताना पर्याप्त व्याख्या नहीं है। राजनीतिक विरोध, छात्रों की नाराजगी और आपराधिक लूटपाट के बीच अंतर समझना जरूरी है। पुलिस के बल प्रयोग और प्रदर्शनकारियों को लगी चोटों पर भी सवाल उठे हैं। इससे बहस केवल कानून व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गई है।
इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी फ्रांस की अशांति को आव्रजन से जोड़ते हुए सीमाएं कड़ी करने की बात कही। वहीं, फ्रांस और इजरायल के संबंधों में फलस्तीनी राज्य की मान्यता जैसे मुद्दों पर पहले से मतभेद हैं। नेतन्याहू की ताजा टिप्पणी इसी तनावपूर्ण पृष्ठभूमि में आई है। मौजूदा घटनाक्रम में हिंसा के जिम्मेदार लोगों की पहचान, विरोध की आर्थिक वजहों और विदेशी नेताओं के राजनीतिक दावों को अलग-अलग परखना आवश्यक है। किसी पूरे धार्मिक समुदाय की भूमिका का निष्कर्ष उपलब्ध तथ्यों से नहीं निकलता।
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