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संरक्षण की उठी मांग
ढाका/पेशावर: पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में ऐतिहासिक रामलीला मंदिर को गिराकर उसकी जगह व्यावसायिक परिसर बनाने की कथित कोशिश का विरोध बढ़ गया है। डेरा इस्माइल खान स्थित इस मंदिर को सील किए जाने पर बांग्लादेश हिंदू सम्मेलन संघ ने गहरी चिंता जताई है। संगठन ने धार्मिक स्थल की सुरक्षा सुनिश्चित करने और वहां पूजा-अर्चना का अधिकार बहाल करने की मांग की है। साथ ही मंदिर के संरक्षण के लिए आवाज उठा रहे स्थानीय हिंदू समुदाय और नागरिक समाज के प्रति समर्थन व्यक्त किया है।
करीब 200 साल पुराना रामलीला मंदिर डेरा इस्माइल खान के रहीम बाजार में स्थित है। स्थानीय हिंदू समुदाय और सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरोध के बाद प्रशासन ने इसे सील किया। रिपोर्टों के अनुसार, मंदिर की इमारत को नुकसान पहुंचाकर वहां व्यावसायिक प्लाजा बनाने की कोशिश की जा रही थी। स्थानीय लोगों के हस्तक्षेप के बाद तोड़फोड़ का काम रोका गया। मंदिर को पूरी तरह ध्वस्त किए जाने की पुष्टि नहीं हुई है; फिलहाल इसके संरक्षण और भविष्य के इस्तेमाल को लेकर विवाद बना हुआ है।
बांग्लादेश हिंदू सम्मेलन संघ ने अपने बयान में कहा कि किसी भी उपासना स्थल को नष्ट करने अथवा जबरन बंद कराने का प्रयास बुनियादी मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध है। संगठन ने समानता और सांप्रदायिक सद्भाव के महत्व पर जोर देते हुए ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों की सुरक्षा को आवश्यक बताया। उसके अनुसार, रामलीला मंदिर जैसी धरोहर को व्यावसायिक इमारत में बदलने की कथित योजना धार्मिक आस्था के साथ सांस्कृतिक विरासत के लिए भी चिंता का विषय है।
संगठन ने पाकिस्तान सरकार से मंदिर परिसर में व्यावसायिक निर्माण की सभी कोशिशों को स्थायी रूप से रोकने की अपील की है। उसने धार्मिक अनुष्ठानों की अनुमति बहाल करने और मामले में जिम्मेदार पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी रखी। बयान में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाने का आग्रह किया गया। स्थानीय स्तर पर मंदिर बचाने के प्रयास कर रहे लोगों के प्रति भी एकजुटता जताई गई।
इस मामले को लेकर डेरा इस्माइल खान में नागरिक समाज और हिंदू समुदाय के प्रतिनिधियों की संयुक्त बैठक भी हुई। सामाजिक संगठन के अध्यक्ष सुहैल अहमद आजमी के कार्यालय में आयोजित बैठक में पूर्व प्रांतीय विधायक किशोर कुमार और सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद नौमान सहित अन्य प्रतिनिधि शामिल हुए। प्रतिभागियों ने मंदिर की जमीन पर व्यावसायिक निर्माण की कथित अनुमति पर आपत्ति जताई। उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों से यह विषय पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में उठाने की अपील की।
बैठक में धार्मिक संपत्ति से जुड़े निर्णयों की पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए। प्रतिनिधियों ने निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा कि ऐतिहासिक धरोहरों को व्यापारिक परिसरों में बदलने से शहर की सांस्कृतिक पहचान को नुकसान पहुंचेगा। नागरिक समाज, व्यापारिक समुदाय और विरासत संरक्षण से जुड़े लोगों ने मंदिर को नुकसान पहुंचाने की किसी भी कोशिश का विरोध करने का संकल्प जताया। प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद परिसर में निर्माण और तोड़फोड़ की गतिविधियां रोक दी गई हैं।
स्थानीय अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों ने मंदिर की मरम्मत और इसे समुदाय को सौंपने की मांग भी की है। सिख समुदाय के प्रतिनिधि बयंत सिंह ने इसके संरक्षण को साझा चिंता बताया। उनके मुताबिक, स्थानीय सिख समुदाय भी होली और दीपावली जैसे अवसरों पर हिंदू मंदिरों का उपयोग करता है। ईसाई समुदाय के प्रतिनिधि पादरी चांद मसीह ने भी मंदिर के धार्मिक महत्व का सम्मान करने और उसके पुनर्वास की जरूरत पर जोर दिया।
वहीं, ऑल पाकिस्तान हिंदू राइट्स मूवमेंट के अध्यक्ष हारून सरब डायल ने धार्मिक स्थलों को विशेष सुरक्षा देने की मांग की है। उन्होंने वर्ष 2013 से 2026 के बीच धार्मिक संपत्तियों पर कथित अवैध कब्जों और बिक्री के मामलों की विस्तृत जांच कराने का आग्रह किया। संबंधित सरकारी संपत्ति प्रबंधन व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही का मुद्दा भी उठा है। फिलहाल समुदाय की प्रमुख मांग मंदिर की इमारत बचाने, उसके धार्मिक स्वरूप की रक्षा करने और भविष्य में व्यावसायिक इस्तेमाल की आशंकाओं को दूर करने की है।
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