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नई दिल्ली। जर्मनी की संसद के पूर्व सदस्य और ग्रीन हाइड्रोजन के पूर्व आयुक्त डॉ. स्टीफन कॉफ़मैन ने भारत और जर्मनी के बीच ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया है। गुरुवार को ANI से बातचीत में उन्होंने कहा कि यूरोप हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था को बड़े पैमाने पर विकसित करने के लिए भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और विशाल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता से काफी उम्मीदें रखता है। उनके मुताबिक, भारत की औद्योगिक क्षमता ग्रीन हाइड्रोजन की उत्पादन लागत को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।कॉफ़मैन ने कहा कि ग्रीन हाइड्रोजन को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए तकनीकी विशेषज्ञता और बड़े पैमाने पर कम लागत वाले उत्पादन का मेल जरूरी है। उन्होंने जर्मनी और भारत की क्षमताओं को एक-दूसरे का पूरक बताया। उनके अनुसार, जर्मनी के पास इलेक्ट्रोलाइजर और हाइड्रोजन तकनीक के क्षेत्र में अत्याधुनिक तकनीक है, जबकि भारत के पास बड़े पैमाने पर विनिर्माण करने और लागत कम करने की क्षमता है।उन्होंने कहा कि जर्मनी में इलेक्ट्रोलाइजर के क्षेत्र में कुछ बेहतरीन तकनीकें मौजूद हैं, लेकिन इनकी लागत अभी काफी अधिक है। ऐसे में जर्मन और भारतीय कंपनियों के बीच सहयोग से उत्पादन लागत घटाने और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की संभावनाएं बन सकती हैं। कॉफ़मैन के मुताबिक, भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का इस्तेमाल करके ग्रीन हाइड्रोजन को ग्रे हाइड्रोजन के मुकाबले अधिक प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकता है।
इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण में साझेदारी की संभावना
कॉफ़मैन ने भारत और जर्मनी के बीच संभावित सहयोग के कई क्षेत्रों का उल्लेख किया। इनमें सबसे महत्वपूर्ण इलेक्ट्रोलाइजर का संयुक्त निर्माण है। इलेक्ट्रोलाइजर वह तकनीक है जिसके जरिए पानी को बिजली की मदद से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जाता है। जब इसमें इस्तेमाल होने वाली बिजली नवीकरणीय स्रोतों से आती है, तो इससे ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन किया जा सकता है।उन्होंने संकेत दिया कि जर्मनी की तकनीकी विशेषज्ञता और भारत की औद्योगिक क्षमता को साथ लाकर बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रोलाइजर उद्योग विकसित किया जा सकता है। इससे न केवल उपकरणों की लागत कम करने में मदद मिल सकती है, बल्कि दोनों देशों की कंपनियों के लिए वैश्विक बाजार में कारोबार के नए अवसर भी खुल सकते हैं।कॉफ़मैन ने यह भी कहा कि भारत से ग्रीन हाइड्रोजन और उसके डेरिवेटिव खरीदकर उन्हें यूरोप और जर्मनी में बेचने के अवसर मौजूद हैं। इसका मतलब है कि संभावित साझेदारी केवल तकनीक और विनिर्माण तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उत्पादन, व्यापार और निर्यात तक पूरी वैल्यू चेन में सहयोग विकसित किया जा सकता है।
भारत की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता पर भरोसा
ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए बड़ी मात्रा में नवीकरणीय बिजली की जरूरत होती है। भारत में सौर और पवन ऊर्जा की क्षमता बढ़ने के साथ ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन के लिए आधार तैयार हो रहा है। कॉफ़मैन ने भारत की तेजी से बढ़ती नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को भी यूरोप के लिए महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा।उन्होंने पहले भी भारत-जर्मनी के बीच ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर जोर दिया है। उनके अनुसार, भारत में नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार की गति और बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन की क्षमता इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।
यूरोप के लिए भारत बन सकता है अहम सप्लायर
कॉफ़मैन ने कहा कि भारत आने वाले समय में ग्रीन हाइड्रोजन और उससे जुड़े उत्पादों का महत्वपूर्ण उत्पादक बन सकता है। भारत से यूरोप को ग्रीन हाइड्रोजन, ग्रीन अमोनिया और अन्य ग्रीन डेरिवेटिव की आपूर्ति की संभावनाओं पर भी चर्चा हो रही है। उनके अनुसार, भारत में इस क्षेत्र में बड़े औद्योगिक समूहों की बढ़ती भागीदारी से उत्पादन और निर्यात की क्षमता विकसित हो रही है।भारत के नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत भी बड़े पैमाने पर उत्पादन क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। 24 सितंबर को सामने आई एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, भारत 2030 तक 50 लाख मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है और 2028-29 से ग्रीन ऊर्जा के निर्यात की संभावना पर भी काम किया जा रहा है।
लागत होगी सबसे बड़ी चुनौती
ग्रीन हाइड्रोजन के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल में सबसे बड़ी चुनौतियों में इसकी उत्पादन लागत शामिल है। फिलहाल पारंपरिक ग्रे हाइड्रोजन की तुलना में ग्रीन हाइड्रोजन कई बाजारों में महंगा पड़ता है। इसकी लागत कम करने के लिए सस्ती नवीकरणीय बिजली, बड़े पैमाने पर उत्पादन और इलेक्ट्रोलाइजर जैसी तकनीकों की कीमत कम करना महत्वपूर्ण माना जाता है।कॉफ़मैन का कहना है कि भारत और जर्मनी की कंपनियां मिलकर इस चुनौती से निपटने में भूमिका निभा सकती हैं। जर्मनी की तकनीकी विशेषज्ञता को भारत की कम लागत वाली मैन्युफैक्चरिंग क्षमता से जोड़ने पर उत्पादन का पैमाना बढ़ाया जा सकता है। इससे वैश्विक बाजार में ग्रीन हाइड्रोजन की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
कारोबार और निर्यात के नए रास्ते
भारत और जर्मनी के बीच सहयोग का एक अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र व्यापार और निर्यात हो सकता है। कॉफ़मैन ने ग्रीन हाइड्रोजन की खरीद और यूरोप तक इसकी आपूर्ति को संभावित अवसर बताया। इसके अलावा इलेक्ट्रोलाइजर और अन्य हाइड्रोजन तकनीकों के संयुक्त उत्पादन से दोनों देशों की कंपनियों को वैश्विक बाजार में विस्तार का अवसर मिल सकता है।डॉ. स्टीफन कॉफ़मैन 2020 से 2022 तक जर्मनी के संघीय शिक्षा एवं अनुसंधान मंत्रालय में ग्रीन हाइड्रोजन के इनोवेशन कमिश्नर रहे थे और जर्मनी की राष्ट्रीय हाइड्रोजन रणनीति के क्रियान्वयन से जुड़े रहे हैं। वह 2009 से 2021 तक जर्मन बुंडेस्टाग के सदस्य भी रहे और 2024-25 में दोबारा संसद के सदस्य रहे।भारत और जर्मनी के बीच ग्रीन हाइड्रोजन सहयोग ऐसे समय में सामने आ रहा है, जब दुनिया में कम कार्बन ऊर्जा स्रोतों और औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन पर जोर बढ़ रहा है। कॉफ़मैन के बयान से स्पष्ट है कि संभावित साझेदारी में तकनीक, मैन्युफैक्चरिंग, उत्पादन, व्यापार और निर्यात जैसे कई क्षेत्र शामिल हो सकते हैं। आने वाले समय में दोनों देशों की कंपनियों के बीच इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण और ग्रीन हाइड्रोजन की सप्लाई से जुड़े समझौते इस सहयोग को व्यावसायिक रूप दे सकते हैं।
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