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फाइल फोटो
भारत-रूस शिखर वार्ता कई मायनों में भारत के लिए महत्वपूर्ण है। सबसे महत्वपूर्ण रूस के साथ रक्षा सहयोग को अगले दस सालों के लिए विस्तारित किया जाना है।
जनता से रिश्ता वेबडेस्क। भारत-रूस शिखर वार्ता कई मायनों में भारत के लिए महत्वपूर्ण है। सबसे महत्वपूर्ण रूस के साथ रक्षा सहयोग को अगले दस सालों के लिए विस्तारित किया जाना है। इससे कई दशकों से चली आ रही भारत-रूस रणनीतिक साझीदारी मजबूत होगी। यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अमेरिका से रक्षा संबंधों में संतुलन कायम रखते हुए भारत ने यह कदम उठाया है। शिखर वार्ता के जरिये यह संदेश भी गया है कि रूस के लिए भी भारत अहम है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन कोरोना काल में जिनेवा में अमेरिका से वार्ता के लिए गए थे, उसके बाद अब भारत आए हैं।
जानकारों का कहना है कि भारत-अमेरिका के बीच रणनीतिक संबंध पहले की तुलना में मजबूत हुए हैं और अमेरिका की कोशिश भी रही है कि भारत रक्षा साजो सामान अमेरिका से खरीदे। लेकिन, भारत ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वह रूस या किसी भी अन्य देश के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों में किसी अन्य देश का दखल नहीं चाहता है।
इसलिए अमेरिका के तमाम विरोध के बावजूद भारत ने सिर्फ रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम खरीद के सौदे को मंजूरी प्रदान की, बल्कि जल्द उसकी आपूर्ति भी शुरू होने वाली है। जबकि अमेरिका ने इसे लेकर भारत को आर्थिक प्रतिबंध लगाने की चेतावनी भी दी थी। इस सिलसिले में रूस के लिए भी भारत का महत्व विवेचना के दायरे में आता है, क्योंकि भारत की अमेरिका से प्रगाढ़ता रूस के हितों के विरुद्ध है। भारत के साथ सहयोग बनाए रखना अमेरिका के प्रभुत्व को नियंत्रित करने के लिए रूस के लिए जरूरी है।
विदेश नीति के जानकार कहते हैं कि मौजूदा भू राजनीतिक परिस्थितियों में भारत की स्थिति अमेरिका के लिए भी महत्वपूर्ण है। इंडो-पैसेफिक क्षेत्र में भारत अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण साझीदार है। क्वाड में भारत की भूमिका अहम है। ऐसे में वह न चाहते हुए भी भारत-रूस के बीच हो रहे रक्षा समझौतों के विरुद्ध बड़ा कदम जैसे आर्थिक प्रतिबंध आदि लगाने की स्थिति में नहीं है। इन परिस्थितियों में भारत के लिए अच्छी स्थिति यह है कि वह एक समुचित तालमेल के साथ रूस के साथ पुरानी दोस्ती को और प्रगाढ़ करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। जबकि अमेरिका के साथ भी उसके सबंध महत्वपूर्ण बने रहेंगे।
जानकारों के अनुसार रूस से रक्षा सहयोग में तकनीक हस्तांतरण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। एके-203 राइफल के अलावा भी रूस संयुक्त उपक्रमों के जरिये कई और रक्षा तकनीक भारत को हस्तांतरित करने के लिए तैयार हो सकता है। ऐसे संकेत मिले हैं। जबकि अमेरिका के ऐसी उम्मीदें कम हैं। उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु रक्षा कॉरीडोर के लिए भारत को निवेश के साथ-साथ तकनीक की भी जरूरत है, जिसे लेकर रूस से रक्षा करार का विस्तर बेहद कारगर साबित होगा। रूस ने निवेश बढ़ाने के भी संकेत दिए हैं।
रूस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के पक्ष में रहा है। उसने कई बार इसका समर्थन किया है। सोमवार को हुई वार्ता के दौरान भी उसने अपने इस दृष्टिकोण को फिर से दोहराया है। कूटनीतिक नजरिये से यह भारत के लिए महत्वपूर्ण है। अमेरिका के साथ-साथ रूस के साथ रक्षा समझौतों को मंजूरी प्रदान कर भारत ने हिंद प्रशांत क्षेत्र में चीन को भी संकेत दिया है। इसी प्रकार पहली बार हुई रूस के साथ हुई टू प्लस टू वार्ता भी महत्वपूर्ण है। अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के बाद रूस चौथा देश है, जिससे टू प्लस ट वार्ता हुई है। यह वार्ता राजनयिक प्रक्रिया और समझौतों के क्रियान्वयन को तीव्र करने में कारगर होती है।
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