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मध्यावधि चुनाव में हार से बढ़ सकती हैं ट्रंप की मुश्किलें, भारत से व्यापार वार्ता पर बड़ा दावा
Ratna Netam
1 Nov 2026 9:06 PM IST

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वॉशिंगटन/नई दिल्ली। अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घरेलू और विदेश नीति को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी अमेरिकी कांग्रेस के किसी एक सदन या दोनों सदनों में बहुमत खो देती है, तो ट्रंप प्रशासन के घरेलू एजेंडे को आगे बढ़ाने में कठिनाइयां बढ़ सकती हैं। हालांकि, भारत और अमेरिका के बीच जारी व्यापार वार्ता पर चुनाव परिणामों का तत्काल और सीधा प्रभाव पड़ना जरूरी नहीं है। व्यापार और विदेश नीति के कई मामलों में अमेरिकी राष्ट्रपति के पास व्यापक कार्यकारी अधिकार होते हैं, जिससे बातचीत जारी रखने की गुंजाइश बनी रह सकती है।अमेरिका में मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति के चार वर्षीय कार्यकाल के बीच आयोजित किए जाते हैं। इस बार प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 35 सीटों पर चुनाव होने हैं। इन चुनावों से यह तय होगा कि राष्ट्रपति ट्रंप के शेष दो वर्षों के कार्यकाल में अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों पर किस दल का नियंत्रण रहेगा। वर्तमान में रिपब्लिकन पार्टी के पास दोनों सदनों में बहुमत है, जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी इसे बदलने का प्रयास कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि डेमोक्रेटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा या सीनेट में बहुमत हासिल करती है, तो राष्ट्रपति ट्रंप के लिए नए घरेलू कानून पारित कराना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विशेष रूप से सरकारी खर्च, बजट, कर व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और आव्रजन संबंधी प्रस्तावों पर राजनीतिक गतिरोध बढ़ सकता है। विपक्षी बहुमत की स्थिति में प्रशासन के फैसलों की संसदीय निगरानी भी मजबूत हो सकती है।विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी कांग्रेस में सत्ता का संतुलन बदलने से राष्ट्रपति की कार्यशैली प्रभावित हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होगा कि प्रशासन की सभी नीतियां रुक जाएंगी। राष्ट्रपति के पास कार्यकारी आदेश जारी करने, विदेश नीति संचालित करने और कुछ व्यापारिक फैसले लेने के अधिकार बने रहेंगे। हालांकि, इन अधिकारों का इस्तेमाल कानून और न्यायिक समीक्षा के अधीन होता है।
अमेरिका के प्रतिष्ठित थिंक टैंक चैथम हाउस के विश्लेषण में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि मध्यावधि चुनाव के परिणाम राष्ट्रपति की राजनीतिक स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन इससे उनकी सभी नीतियों पर तत्काल रोक लगना जरूरी नहीं है। इसी प्रकार रॉयटर्स की रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने बताया है कि कांग्रेस में डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थिति मजबूत होने पर प्रशासन की जांच, बजट संबंधी बातचीत और विधायी गतिविधियों में बदलाव संभव है।भारत के दृष्टिकोण से इन चुनावों का महत्व विशेष रूप से व्यापारिक संबंधों के कारण बढ़ जाता है। अमेरिका भारतीय वस्तुओं और सेवाओं के लिए एक प्रमुख बाजार है। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर लंबे समय से बातचीत चल रही है। इसमें आयात शुल्क, बाजार पहुंच, व्यापारिक नियमों और विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दे शामिल हैं।फरवरी 2026 में भारत और अमेरिका ने एक अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा घोषित की थी। उस समय अमेरिकी पक्ष ने भारतीय वस्तुओं पर 18 प्रतिशत पारस्परिक शुल्क दर लागू करने की बात कही थी। हालांकि, बाद में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कारण आपातकालीन शक्तियों के आधार पर लगाए गए कई शुल्कों की कानूनी स्थिति बदल गई। इसके बाद व्यापक व्यापार समझौते को लेकर बातचीत में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी।
अक्टूबर के अंत तक दोनों देशों के बीच अंतिम व्यापक व्यापार समझौता नहीं हो पाया था। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने संकेत दिया था कि समझौता तत्काल होने की स्थिति में नहीं है। वहीं, भारतीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी बातचीत में सीमित गुंजाइश और गतिरोध की स्थिति का उल्लेख किया था।विश्लेषकों के अनुसार, मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी को सफलता मिलने पर अमेरिकी व्यापार नीति की संसदीय समीक्षा बढ़ सकती है। कांग्रेस की समितियां आयात शुल्क, व्यापारिक छूट और विदेशी निवेश से जुड़े फैसलों पर अधिक सवाल उठा सकती हैं। हालांकि, इससे भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता अपने आप समाप्त नहीं होगी।रॉयटर्स की 1 नवंबर की रिपोर्ट के अनुसार, डेमोक्रेटिक पार्टी यदि कांग्रेस में मजबूत स्थिति हासिल करती है, तो ट्रंप प्रशासन की शुल्क नीति पर सवाल बढ़ सकते हैं। इसके बावजूद राष्ट्रपति के वीटो अधिकार और अन्य कार्यकारी शक्तियों के कारण आयात शुल्क संबंधी नीतियों में तत्काल व्यापक बदलाव की संभावना सीमित मानी जा रही है।भारत के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा एच-1बी वीजा और आव्रजन नीति है। बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर अमेरिकी तकनीकी और सेवा क्षेत्र में काम करते हैं। ट्रंप प्रशासन की वीजा संबंधी नीतियों पर कानूनी और राजनीतिक विवाद जारी हैं। कांग्रेस में सत्ता संतुलन बदलने से इन मुद्दों पर चर्चा और निगरानी बढ़ सकती है, लेकिन वीजा नियमों में तत्काल राहत मिलने की गारंटी नहीं होगी।
रक्षा सहयोग और रणनीतिक साझेदारी भी भारत-अमेरिका संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा, तकनीकी सहयोग और आपूर्ति श्रृंखलाओं को लेकर दोनों देशों के साझा हित मौजूद हैं। ऐसे में अमेरिकी घरेलू राजनीति में बदलाव के बावजूद द्विपक्षीय संवाद जारी रहने की संभावना बनी रह सकती है।हालांकि, विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि व्यापार वार्ता को पूरी तरह सुरक्षित मानना जल्दबाजी होगी। अमेरिकी प्रशासन की प्राथमिकताओं, आयात शुल्क संबंधी कानूनी फैसलों, कांग्रेस की भूमिका और दोनों देशों की बातचीत में वास्तविक प्रगति का समझौते पर असर पड़ सकता है।फिलहाल सभी की नजर 3 नवंबर को होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनाव पर है। चुनाव परिणाम राष्ट्रपति ट्रंप के घरेलू राजनीतिक एजेंडे के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे। भारत के लिए मुख्य सवाल यह रहेगा कि वॉशिंगटन में संभावित राजनीतिक बदलाव के बीच व्यापार वार्ता कितनी तेजी से आगे बढ़ती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, घरेलू नीतियों पर ट्रंप प्रशासन को अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन भारत के साथ आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को आगे बढ़ाने के रास्ते पूरी तरह बंद होने की संभावना नहीं है।
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