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Ukraine की मिसाइल मांग पर जर्मनी का फैसला बदल सकता है?

Uma Verma
3 April 2025 3:35 PM IST
Ukraine की मिसाइल मांग पर जर्मनी का फैसला बदल सकता है?
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वर्ल्ड | रूस के साथ जारी युद्ध में यूक्रेन को 500 किमी तक मार करने वाली Taurus क्रूज मिसाइल की सख्त जरूरत है, लेकिन अब तक जर्मनी ने इसे देने से इनकार किया है। पूर्व जर्मन चांसलर ओलाफ शॉल्त्स ने कई बार यूक्रेन की इस मांग को खारिज किया, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे युद्ध और भड़क सकता है। हालांकि, अब जब जर्मनी में नई सरकार का गठन हो रहा है, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की को उम्मीद है कि बदले हालात में यह हथियार उन्हें मिल सकता है।

Taurus मिसाइल क्यों अहम है?

Taurus क्रूज मिसाइल को यूरोप के सबसे ताकतवर हथियारों में से एक माना जाता है। यह 500 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तक लक्ष्य को भेद सकती है और दुश्मन की सुरक्षित बंकरों, पुलों और कमांड सेंटरों को तबाह कर सकती है। इसकी गति इतनी ज्यादा होती है कि रूस के एयर डिफेंस सिस्टम के लिए इसे रोक पाना बेहद मुश्किल है। यही वजह है कि यूक्रेन इस हथियार को पाना चाहता है, ताकि वह रूसी सेना के गढ़ पर हमला कर सके।

जर्मनी क्यों कर रहा है इनकार?

हालांकि, जर्मनी की अब तक की नीति Taurus मिसाइल को लेकर सावधानी बरतने की रही है। पूर्व चांसलर ओलाफ शॉल्त्स का मानना था कि अगर यूक्रेन को यह मिसाइल दी जाती है, तो वह इसका इस्तेमाल रूसी क्षेत्र में हमले के लिए कर सकता है, जिससे पश्चिमी देशों की सीधी टक्कर रूस से हो सकती है। जर्मनी पहले ही यूक्रेन को कई तरह की सैन्य मदद दे चुका है, लेकिन वह अपने फैसलों में रूस को उकसाने से बचना चाहता था।

नई सरकार से क्या उम्मीद?

अब जब जर्मनी में नई सरकार बनने जा रही है, यूक्रेन को उम्मीद है कि उसे Taurus मिसाइल मिल सकती है। जर्मनी में कुछ राजनीतिक दल पहले ही इस समर्थन में रहे हैं कि यूक्रेन को ज्यादा मजबूत हथियार दिए जाएं। अगर नई सरकार इस पर मुहर लगाती है, तो यह रूस-यूक्रेन युद्ध के समीकरण को पूरी तरह बदल सकता है।

क्या जर्मनी अपना रुख बदलेगा?

जर्मनी के अंदर भी इस मुद्दे पर राजनीतिक मतभेद बने हुए हैं। कुछ नेता मानते हैं कि यूक्रेन को Taurus मिसाइल देना सही रहेगा, जबकि कुछ का मानना है कि इससे जर्मनी और रूस के रिश्ते और बिगड़ सकते हैं। अगर नई सरकार इस फैसले को बदलती है, तो यह न सिर्फ युद्ध का बड़ा मोड़ होगा बल्कि पश्चिमी देशों की रणनीति में भी बदलाव ला सकता है।

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