विश्व
संयुक्त राष्ट्र में बदलाव की मांग तेज जयशंकर ने टेक्स्ट आधारित बातचीत पर दिया जोर
Ratna Netam
25 Sept 2026 8:50 PM IST

x
न्यूयॉर्क। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र में लंबे समय से लंबित सुधारों को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि संस्थागत बदलावों में प्रगति नहीं होने से अंतरराष्ट्रीय समुदाय में निराशा बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि जो देश या पक्ष संयुक्त राष्ट्र में सुधार का विरोध कर रहे हैं, वे वास्तव में संस्था की चिंता करने के बजाय उसका अपने हितों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए टेक्स्ट आधारित बातचीत शुरू करने की जरूरत पर विशेष जोर दिया।जयशंकर गुरुवार को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र से इतर आयोजित मंत्री स्तरीय कार्यक्रम ‘Ruptures & Ramparts: Building Bridges for a Changing World’ को संबोधित कर रहे थे। इस कार्यक्रम का आयोजन ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, रिलायंस फाउंडेशन, भारत में संयुक्त राष्ट्र और संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन ने मिलकर किया था। कार्यक्रम 24 सितंबर को न्यूयॉर्क में आयोजित हुआ।
कार्यक्रम के दौरान जयशंकर ने कहा कि हर साल संयुक्त राष्ट्र महासभा के लिए दुनिया के नेता न्यूयॉर्क पहुंचते हैं और संयुक्त राष्ट्र में सुधार का मुद्दा उठता है। उनके मुताबिक इस बार सुधार की भावना पहले की तुलना में और मजबूत दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देशों में यह धारणा बढ़ रही है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय संस्थागत व्यवस्था आज की वैश्विक वास्तविकताओं को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करती।जयशंकर ने सुधार प्रक्रिया में टेक्स्ट आधारित वार्ता की आवश्यकता बताते हुए कहा कि अगर देश वास्तव में सुधार चाहते हैं तो बातचीत के लिए एक लिखित आधार होना जरूरी है। उन्होंने कहा, “अगर हम सुधार को लेकर गंभीर हैं तो हमें टेक्स्ट आधारित बातचीत की जरूरत है, क्योंकि बिना टेक्स्ट के बातचीत नहीं हो सकती। तब वह बातचीत नहीं होती, बल्कि सिर्फ समय हासिल करने की कोशिश होती है।”
विदेश मंत्री का यह बयान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की भारत की लंबे समय से चली आ रही मांग की पृष्ठभूमि में आया है। भारत सुरक्षा परिषद की स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में सदस्यता के विस्तार की वकालत करता रहा है। विदेश मंत्रालय के दस्तावेजों में भी भारत ने इंटरगवर्नमेंटल नेगोशिएशंस यानी IGN प्रक्रिया में टेक्स्ट आधारित वार्ता और व्यापक सुरक्षा परिषद सुधार को आगे बढ़ाने की अपनी स्थिति दोहराई है।जयशंकर ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र को लेकर आलोचना करने का मतलब संस्था के खिलाफ होना नहीं है। उनके अनुसार जो देश वास्तव में संयुक्त राष्ट्र को मजबूत देखना चाहते हैं, वे चाहते हैं कि संस्था बदलती दुनिया के अनुरूप खुद को ढाले। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र को कई देशों द्वारा वैश्विक बदलावों से पीछे माना जा रहा है और यही सुधार की मांग का मुख्य आधार है।
इसी संदर्भ में जयशंकर ने सुधार का विरोध करने वालों पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि उनके विचार में सुधार का विरोध करने वाले वास्तव में संयुक्त राष्ट्र की चिंता नहीं करते। वे संस्था का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन उसमें जरूरी बदलाव नहीं चाहते। यह जयशंकर का राजनीतिक और कूटनीतिक आकलन था, जिसे उन्होंने सुधार के पक्ष में भारत के तर्क के रूप में सामने रखा।जयशंकर ने इस विचार को भी खारिज किया कि संयुक्त राष्ट्र में बड़े सुधार केवल सर्वसम्मति से ही किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि पहले एक टेक्स्ट सामने आना चाहिए, उस पर देशों को बातचीत करने और अपने विचार रखने का अवसर मिलना चाहिए और उसके बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत फैसला किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि सुधार के लिए हर देश की पूर्ण सहमति की प्रतीक्षा करना प्रक्रिया को आगे बढ़ने से रोक सकता है।
मंत्री स्तरीय सत्र में जयशंकर के अलावा जमैका की विदेश एवं विदेश व्यापार मंत्री कामिना जॉनसन स्मिथ, सूरीनाम के विदेश मंत्री मेलविन बौवा और घाना के विदेश मंत्री सैमुअल ओकुडजेटो अब्लाकवा सहित कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का संचालन ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष समीर सरन ने किया।कार्यक्रम में बदलती वैश्विक व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की भूमिका और ग्लोबल साउथ से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई। जयशंकर ने कहा कि ग्लोबल साउथ के देशों के बीच एक-दूसरे के साथ सहयोग करने और पारंपरिक निर्भरता कम करने की इच्छा बढ़ी है। उन्होंने इसे अधिक लोकतांत्रिक वैश्विक व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में प्रस्तुत किया।भारत लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था को दर्शाती है, जबकि उसके बाद दुनिया में राजनीतिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय स्तर पर बड़े बदलाव हो चुके हैं। भारत का कहना है कि एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और ग्लोबल साउथ को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में फिलहाल पांच स्थायी सदस्य अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन हैं। इन पांचों के पास वीटो का अधिकार है। इसके अलावा 10 अस्थायी सदस्य दो साल के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं। सुरक्षा परिषद के विस्तार और वीटो सहित कई मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच लंबे समय से मतभेद हैं, जिसके कारण सुधार प्रक्रिया में निर्णायक प्रगति नहीं हो सकी है।भारत ब्राजील, जर्मनी और जापान के साथ G4 समूह के जरिए भी सुरक्षा परिषद में सुधार और स्थायी सदस्यता के विस्तार की मांग करता रहा है। इसके अलावा भारत L.69 और अफ्रीकी देशों के C-10 जैसे सुधार समर्थक समूहों के साथ भी समन्वय करता है। विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में सुरक्षा परिषद के विस्तार का समर्थन करता है।जयशंकर की ताजा टिप्पणी इसी लंबे समय से चल रही बहस को आगे बढ़ाती है। उनका मुख्य जोर इस बात पर रहा कि सुधार पर केवल सामान्य चर्चा करते रहने के बजाय सदस्य देशों को अब लिखित प्रस्ताव के आधार पर वास्तविक बातचीत की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र में सुधार की मांग को संस्था-विरोधी रुख के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप संस्था में बदलाव करना ही उसे प्रासंगिक और प्रभावी बनाए रखने का तरीका है।UNGA के 81वें सत्र के दौरान भारत ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार को अपनी प्रमुख कूटनीतिक प्राथमिकताओं में रखा है। जयशंकर के बयान से स्पष्ट है कि भारत अब टेक्स्ट आधारित वार्ता को आगे बढ़ाने पर विशेष जोर दे रहा है। साथ ही भारत का तर्क है कि सुधार प्रक्रिया में लगातार देरी से सदस्य देशों की निराशा बढ़ रही है और संयुक्त राष्ट्र की प्रतिनिधित्व क्षमता तथा प्रभावशीलता को लेकर सवाल और गंभीर हो रहे हैं।
Next Story





