विश्व

'इस्लामिक नाटो' जैसी पहल? तीन देशों के रक्षा समझौते ने खींचा दुनिया का ध्यान

Ratna Netam
7 Aug 2026 6:07 PM IST
इस्लामिक नाटो जैसी पहल? तीन देशों के रक्षा समझौते ने खींचा दुनिया का ध्यान
x
दिल्ली : पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के बीच पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने शुक्रवार को मक्का में एक महत्वपूर्ण त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते को "मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट" नाम दिया गया है। तीनों देशों का कहना है कि इसका उद्देश्य रक्षा सहयोग को मजबूत करना, सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करना और क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देना है। समझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी रणनीतिक अहमियत को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयान के अनुसार, समझौते के तहत यदि किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला होता है तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इसके अलावा रक्षा क्षेत्र में समन्वय बढ़ाने, सैन्य प्रशिक्षण, संयुक्त अभ्यास, खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान तथा रक्षा तकनीक के क्षेत्र में सहयोग को मजबूत करने पर भी सहमति बनी है।
यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब पश्चिम एशिया लगातार अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री सुरक्षा को लेकर तनाव बना हुआ है, जबकि ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। इसी पृष्ठभूमि में तीनों देशों का यह रक्षा सहयोग वैश्विक रणनीतिक हलकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।
रिपोर्टों के अनुसार मक्का में हुई बैठक में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ शामिल हुए। शहबाज शरीफ तीन दिवसीय दौरे पर सऊदी अरब पहुंचे थे। उनके साथ पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर समेत उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद था।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता तीन अलग-अलग क्षमताओं वाले देशों को एक साझा सुरक्षा ढांचे में जोड़ता है। सऊदी अरब आर्थिक रूप से मजबूत और ऊर्जा संसाधनों से समृद्ध देश है, जबकि तुर्की का रक्षा उद्योग तेजी से विकसित हो रहा है और वह नाटो का सदस्य भी है। दूसरी ओर पाकिस्तान परमाणु क्षमता रखने वाला देश है। ऐसे में रक्षा उत्पादन, तकनीकी सहयोग और सैन्य समन्वय के लिहाज से यह साझेदारी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
भारतीय सुरक्षा और रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ भी इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल वेद मलिक ने इस तरह के सैन्य गठबंधनों को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए चुनौतीपूर्ण बताया है। उनका कहना है कि नए सैन्य समूह बनने से भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है और विभिन्न देशों के बीच रणनीतिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भारत को बदलते हालात के अनुरूप अपनी कूटनीतिक और सुरक्षा रणनीति पर लगातार काम करना होगा।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस समझौते के तहत तुर्की की रक्षा तकनीक, सऊदी अरब का आर्थिक सहयोग और पाकिस्तान की सैन्य आवश्यकताएं एक साथ आगे बढ़ती हैं, तो भविष्य में क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर इसका असर देखने को मिल सकता है। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि समझौते के सभी प्रावधान किस तरह और कितने समय में लागू होंगे।
विश्लेषकों का यह भी कहना है कि भारत और पाकिस्तान के बीच किसी संभावित सैन्य तनाव की स्थिति में सऊदी अरब या तुर्की के सीधे युद्ध में शामिल होने की संभावना बेहद कम है। इसकी प्रमुख वजह भारत की मजबूत सैन्य क्षमता, परमाणु प्रतिरोधक शक्ति और दोनों देशों के साथ उसके व्यापक व्यापारिक तथा कूटनीतिक संबंध हैं। सऊदी अरब और तुर्की दोनों के भारत के साथ आर्थिक हित जुड़े हुए हैं, इसलिए वे प्रत्यक्ष सैन्य टकराव से बचने की कोशिश करेंगे।
फिलहाल "मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट" को पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। आने वाले समय में यह समझौता किस रूप में लागू होता है और क्षेत्रीय तथा वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पर इसका कितना प्रभाव पड़ता है, इस पर दुनिया की नजर बनी रहेगी।
Next Story