
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने शुक्रवार को विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी FCRA में प्रस्तावित बदलावों को लेकर अमेरिकी सांसद की ओर से की गई आलोचना को खारिज कर दिया। सरकार ने स्पष्ट किया कि विदेशी चंदे से जुड़े नियम और कानून भारत के घरेलू अधिकार क्षेत्र का विषय हैं और इन पर निर्णय लेने का अधिकार भारतीय संसद के पास है।
विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत में कानून बनाने की प्रक्रिया संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत होती है। उन्होंने कहा कि किसी भी कानून में बदलाव का फैसला भारतीय संस्थाएं और संसद करती हैं।
FCRA में प्रस्तावित बदलाव को लेकर विवाद
विदेशी चंदे को नियंत्रित करने वाले FCRA कानून में प्रस्तावित बदलावों को लेकर हाल ही में चर्चा तेज हुई थी। इसी क्रम में एक अमेरिकी सांसद ने इन बदलावों पर चिंता जताई थी।
इस पर भारत सरकार ने कहा कि विदेशी योगदान से जुड़े नियम बनाना देश की संप्रभु प्रक्रिया का हिस्सा है और किसी बाहरी टिप्पणी के आधार पर भारत अपनी नीतियां तय नहीं करता।
विदेश मंत्रालय ने कहा कि हर देश अपने राष्ट्रीय हितों, सुरक्षा और पारदर्शिता को ध्यान में रखते हुए विदेशी वित्तीय प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाता है।
भारत ने बताया घरेलू अधिकार क्षेत्र का मामला
MEA प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि FCRA पूरी तरह से भारत के घरेलू कानूनी ढांचे का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि देश में विदेशी फंड से जुड़े मामलों को नियंत्रित करने के लिए कानून मौजूद है और इसमें समय-समय पर जरूरत के अनुसार बदलाव किए जाते हैं।
उन्होंने कहा कि भारत की संसद को कानून बनाने और उनमें संशोधन करने का पूरा अधिकार है।
सरकार का कहना है कि विदेशी योगदान से जुड़े नियमों का उद्देश्य पारदर्शिता बनाए रखना और यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्यों के लिए ही हो।
कई देशों में मौजूद हैं विदेशी फंड से जुड़े कानून
रणधीर जायसवाल ने कहा कि केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में विदेशी धन के लेन-देन को नियंत्रित करने वाले कानून हैं।
उन्होंने विशेष रूप से कहा कि अमेरिका सहित कई देशों में विदेशी फंडिंग से जुड़े नियम और निगरानी व्यवस्था मौजूद है।
भारत सरकार का तर्क है कि जिस तरह अन्य देश अपने यहां विदेशी वित्तीय गतिविधियों को नियंत्रित करते हैं, उसी तरह भारत भी अपने कानूनों के माध्यम से विदेशी योगदान की निगरानी करता है।
पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर
सरकार की ओर से कहा गया है कि विदेशी योगदान से जुड़े नियमों का उद्देश्य संगठनों और संस्थाओं के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
FCRA के तहत विदेशी सहायता प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए कई नियम निर्धारित हैं, ताकि धन के स्रोत और उसके उपयोग की जानकारी स्पष्ट रहे।
प्रस्तावित बदलावों को भी इसी उद्देश्य से जोड़कर देखा जा रहा है।
संसद में होगी कानून पर चर्चा
केंद्र सरकार ने कहा कि किसी भी विधायी बदलाव पर अंतिम फैसला संसद की प्रक्रिया के तहत ही होगा। संसद में चर्चा, सुझाव और समीक्षा के बाद ही कानून में संशोधन किए जाते हैं।
सरकार का कहना है कि भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं देश के कानूनों को तय करने में सक्षम हैं और विदेशी टिप्पणियां इस प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर सकतीं।
विदेश मंत्रालय का रुख स्पष्ट
विदेश मंत्रालय ने इस मुद्दे पर भारत का रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि देश अपने कानूनों और नीतियों का निर्माण अपनी परिस्थितियों और जरूरतों के आधार पर करता है।
मंत्रालय ने कहा कि विदेशी योगदान से संबंधित नियमों का मकसद राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना और वित्तीय पारदर्शिता को मजबूत करना है।
राजनीतिक बहस के बीच सरकार का बयान
FCRA में प्रस्तावित बदलावों को लेकर देश में भी राजनीतिक बहस जारी है। विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सरकार से स्पष्टीकरण की मांग की है, जबकि सरकार का कहना है कि कानून में बदलाव का उद्देश्य व्यवस्था को मजबूत करना है।
इस पूरे विवाद के बीच केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि FCRA से जुड़े फैसले भारत की संसद और संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
सरकार के अनुसार, विदेशी फंडिंग को लेकर पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था बनाए रखना किसी भी देश की जिम्मेदारी है और भारत भी इसी दिशा में काम कर रहा है।





