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नई दिल्ली। ब्रिटेन में चीन में बनी इलेक्ट्रिक कारों की तेजी से बढ़ती मौजूदगी अब सरकार के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। ब्रिटेन चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों पर भारी टैरिफ लगाने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह चीन से आने वाली कम कीमत वाली इलेक्ट्रिक कारें हैं, जिनकी ब्रिटिश बाजार में पकड़ लगातार मजबूत हो रही है। सरकार को आशंका है कि चीन में मिलने वाली सब्सिडी के कारण वहां की कंपनियां कम कीमत पर इलेक्ट्रिक वाहन ब्रिटेन के बाजार में उतार रही हैं, जिससे स्थानीय वाहन कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है।
इलेक्ट्रिक वाहन बाजार पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रहा है। पर्यावरण से जुड़े लक्ष्यों और पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के बीच कई देशों में इलेक्ट्रिक कारों की मांग बढ़ी है। इसी अवसर का फायदा चीन की वाहन कंपनियों ने भी उठाया है। चीन इलेक्ट्रिक वाहन और उनसे जुड़ी सप्लाई चेन में बड़ा खिलाड़ी बनकर सामने आया है। कम कीमत और कई विकल्पों के कारण चीनी इलेक्ट्रिक कारें अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं।
ब्रिटेन में भी यही स्थिति सरकार की चिंता बढ़ा रही है। अगर कम कीमत वाली आयातित कारों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ती रही तो स्थानीय वाहन निर्माताओं के लिए कीमत के स्तर पर प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो सकता है। घरेलू कंपनियों को उत्पादन, कर्मचारियों और तकनीक पर बड़ा निवेश करना पड़ता है। ऐसे में अगर आयातित इलेक्ट्रिक वाहन कम कीमत पर उपलब्ध होते हैं तो बाजार में प्रतिस्पर्धा का संतुलन प्रभावित हो सकता है।
इसी स्थिति को देखते हुए चीनी इलेक्ट्रिक कारों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की चर्चा सामने आई है। टैरिफ बढ़ने का सीधा असर चीन से ब्रिटेन भेजी जाने वाली कारों की लागत पर पड़ सकता है। अगर आयात शुल्क बढ़ता है तो कंपनियों के लिए मौजूदा कीमतों पर वाहन बेचना मुश्किल हो सकता है। इसके बाद उन्हें कीमत बढ़ाने या अपनी कारोबारी रणनीति में बदलाव करने की जरूरत पड़ सकती है।
हालांकि टैरिफ लगाने का फैसला केवल चीन और ब्रिटेन के वाहन उद्योग तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर ब्रिटेन के पूरे इलेक्ट्रिक वाहन बाजार पर दिखाई दे सकता है। चीनी कारों की कीमत बढ़ने से स्थानीय कंपनियों के अलावा दूसरे देशों की वाहन कंपनियों को भी बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।
यहीं से भारत के लिए संभावित अवसर की चर्चा शुरू होती है। भारत और ब्रिटेन के बीच हाल में हुई बड़ी व्यापारिक डील के बाद दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को लेकर नई संभावनाएं देखी जा रही हैं। अगर ब्रिटेन चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों पर अतिरिक्त शुल्क लगाता है और भारतीय उत्पादों के लिए व्यापारिक परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं तो भविष्य में भारतीय वाहन कंपनियों के लिए ब्रिटिश बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का अवसर बन सकता है।
हालांकि इसे भारत के लिए तत्काल फायदा मान लेना जल्दबाजी होगी। ब्रिटेन के इलेक्ट्रिक वाहन बाजार में जगह बनाने के लिए केवल कम टैरिफ या किसी दूसरे देश पर ज्यादा शुल्क लगना पर्याप्त नहीं होगा। भारतीय वाहन कंपनियों को कीमत, तकनीक, सुरक्षा, गुणवत्ता और ब्रिटिश नियमों के अनुसार वाहन तैयार करने जैसी कई चुनौतियों को पूरा करना होगा।
इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग में बैटरी सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में शामिल है। वाहन की कीमत, उसकी रेंज और प्रदर्शन में बैटरी की बड़ी भूमिका होती है। इसलिए भारतीय कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहन उत्पादन के साथ बैटरी और संबंधित तकनीक पर भी मजबूत पकड़ बनानी होगी।
भारत का इलेक्ट्रिक वाहन बाजार भी तेजी से विकसित हो रहा है। देश में कई वाहन कंपनियां इलेक्ट्रिक कारों और दूसरे इलेक्ट्रिक वाहनों पर काम कर रही हैं। घरेलू बाजार बड़ा होने के कारण कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने और नई तकनीक विकसित करने का अवसर मिल रहा है। अगर भविष्य में निर्यात के लिए बेहतर परिस्थितियां बनती हैं तो यही उत्पादन क्षमता अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी काम आ सकती है।
ब्रिटेन में चीनी कारों पर संभावित टैरिफ भारतीय कंपनियों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि इससे बाजार में कीमतों का अंतर बदल सकता है। अभी चीन की कंपनियों की बड़ी ताकत प्रतिस्पर्धी कीमत मानी जाती है। अगर अतिरिक्त शुल्क के कारण उनकी कारें महंगी होती हैं तो दूसरे देशों के निर्माताओं के लिए मुकाबला कुछ आसान हो सकता है।
इसके बावजूद भारतीय कंपनियों के सामने मजबूत अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा रहेगी। ब्रिटेन का ऑटो बाजार कई वैश्विक ब्रांडों के लिए महत्वपूर्ण है। यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और दूसरे देशों की कंपनियां भी इलेक्ट्रिक वाहन बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। इसलिए चीन पर संभावित टैरिफ का फायदा केवल भारत को मिलेगा, ऐसा मानना सही नहीं होगा।
ब्रिटेन के लिए भी फैसला आसान नहीं है। ज्यादा टैरिफ से स्थानीय उद्योग को कुछ सुरक्षा मिल सकती है, लेकिन इससे ग्राहकों के लिए सस्ती इलेक्ट्रिक कारों के विकल्प कम होने या उनकी कीमत बढ़ने का खतरा भी रहता है। इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से अपनाने के लक्ष्य के बीच सरकार को घरेलू उद्योग की सुरक्षा और ग्राहकों के हितों के बीच संतुलन बनाना होगा।
व्यापारिक फैसलों का असर कई स्तरों पर होता है। किसी देश से आने वाले उत्पादों पर टैरिफ बढ़ने से दूसरे देशों के लिए अवसर पैदा हो सकता है, लेकिन यह अवसर अपने आप कारोबार में नहीं बदलता। इसके लिए कंपनियों को सही कीमत, बेहतर उत्पाद और मजबूत सप्लाई चेन के साथ बाजार में उतरना पड़ता है।
भारत के लिए ब्रिटेन के साथ व्यापारिक संबंधों का मजबूत होना निश्चित रूप से नए अवसरों का रास्ता खोल सकता है। ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रिक वाहन क्षेत्र भी इनमें शामिल हो सकता है। लेकिन वास्तविक फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि ब्रिटेन चीनी इलेक्ट्रिक कारों को लेकर अंतिम नीति क्या अपनाता है और भारत-ब्रिटेन व्यापारिक समझौते के तहत वाहन क्षेत्र के लिए वास्तविक नियम और शुल्क किस तरह लागू होते हैं।
फिलहाल ब्रिटेन में चीनी इलेक्ट्रिक कारों की बढ़ती हिस्सेदारी ने स्थानीय वाहन उद्योग को लेकर नई बहस जरूर शुरू कर दी है। अगर सरकार चीन में बनी इलेक्ट्रिक कारों पर भारी टैरिफ लगाने का फैसला करती है तो वैश्विक वाहन कंपनियों के बीच ब्रिटिश बाजार को लेकर प्रतिस्पर्धा का नया दौर शुरू हो सकता है। ऐसे में भारत के पास भी अवसर हो सकता है, लेकिन इसका वास्तविक लाभ उठाने के लिए भारतीय कंपनियों को तकनीक, कीमत और गुणवत्ता के मोर्चे पर मजबूत तैयारी करनी होगी।
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