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Religion धर्म : निर्जला एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत कठोर उपवासों में से एक है, जिसका पारण द्वादशी तिथि में विधि-विधान के साथ किया जाता है। पारण के समय सबसे पहले तुलसी दल के साथ जल या चरणामृत ग्रहण करने की परंपरा कई घरों में देखी जाती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी को भगवान विष्णु की अत्यंत प्रिय माना गया है। इसी कारण व्रत पारण के समय तुलसी का प्रयोग शुभ और फलदायी माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि तुलसी दल के बिना विष्णु पूजन अधूरा माना जाता है और पारण की प्रक्रिया भी तभी पूर्ण होती है जब तुलसी का समावेश हो।
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, पारण के समय तुलसी का उपयोग शुद्धता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। इसे ग्रहण करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होने की मान्यता है। यही कारण है कि अधिकांश वैष्णव परंपराओं में जल या चरणामृत में तुलसी डालकर ही व्रत खोला जाता है।
लेकिन कई बार ऐसी स्थिति भी बन जाती है जब घर में तुलसी उपलब्ध नहीं होती। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या व्रत का पारण नहीं किया जा सकता? धार्मिक विद्वानों के अनुसार, यदि तुलसी उपलब्ध न हो तो भी व्रत का पारण किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में केवल शुद्ध जल, फल या सात्विक भोजन से भी व्रत खोला जा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि व्रत का मूल उद्देश्य मन और शरीर की शुद्धता तथा संयम है, न कि केवल किसी एक सामग्री पर निर्भरता। इसलिए श्रद्धा और विधि के साथ किया गया पारण ही सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
कई धार्मिक परंपराओं में यह भी बताया गया है कि यदि तुलसी उपलब्ध न हो, तो मन में भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए जल या हल्के सात्विक भोजन से व्रत का पारण किया जा सकता है। इससे व्रत का फल कम नहीं होता, बल्कि श्रद्धा ही सबसे बड़ा आधार होती है।
कुल मिलाकर, निर्जला एकादशी के पारण में तुलसी का विशेष महत्व जरूर है, लेकिन इसकी अनुपस्थिति में भी श्रद्धा और शुद्ध आचरण के साथ व्रत पूरा किया जा सकता है। यही संदेश धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषाचार्यों दोनों द्वारा दिया जाता है।





