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Varaha Jayanti Katha: आज यानी 25 अगस्त को वराह जयंती है, जो भगवान विष्णु के तीसरे अवतार को समर्पित है। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, श्री हरि विष्णु ने सृष्टि की रक्षा और दुष्टों का नाश करने के लिए अनेक अवतार लिए। भगवान विष्णु के 24 अवतारों में से 10 सबसे प्रमुख माने जाते हैं और उन्हीं में से एक है वराह अवतार। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर पृथ्वी को हिरण्याक्ष से मुक्त कराया था। इसी कारण इस दिन को वराह जयंती के रूप में मनाया जाता है। आइए पढ़ते हैं वराह जयंती की कथा।
वराह अवतार कथा:
धर्म ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, एक बार सप्त ऋषि वैकुंठ लोक पहुँचे लेकिन वहाँ के द्वारपाल जय और विजय ने उन सप्त ऋषियों को द्वार पर ही रोक दिया, जिससे क्रोधित होकर उन्होंने श्राप दिया कि उन दोनों को तीन जन्मों तक पृथ्वी पर राक्षस रूप में रहना होगा। पहले जन्म में दोनों कश्यप और दिति के पुत्र के रूप में जन्मे और उनके नाम हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष थे। दोनों ने पृथ्वी वासियों को सताना शुरू कर दिया। दिन-प्रतिदिन पृथ्वी पर दोनों के अत्याचार बढ़ते ही जा रहे थे। यज्ञ आदि करने पर भी हिरण्याक्ष लोगों को परेशान करने लगा।
इस प्रकार भगवान वराह का जन्म हुआ:
एक दिन हिरण्याक्ष घूमते-घूमते वरुण देव की नगरी में पहुँच गया। पाताल लोक में जाकर हिरण्याक्ष वरुण देव को युद्ध के लिए ललकारने लगा। तब वरुण देव ने कहा कि मैं आप जैसे बलवान योद्धा से युद्ध करने में सक्षम नहीं हूँ, इसलिए मैं आपसे युद्ध नहीं कर सकता। आप विष्णु जी से युद्ध करें। तब सभी देवताओं ने ब्रह्मा जी और विष्णु जी से हिरण्याक्ष से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। यह सुनकर ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए अपनी नाक से वराह नारायण को जन्म दिया। इस प्रकार भगवान विष्णु के वराह अवतार का जन्म हुआ।
भगवान वराह अवतार द्वारा हिरण्याक्ष का अंत:
वरुण देव की बातें सुनकर हिरण्याक्ष ने देवर्षि नारद से विष्णु जी का पता पूछा। देवर्षि नारद ने उन्हें बताया कि भगवान विष्णु वराह का रूप धारण करके पृथ्वी को समुद्र से बाहर निकालने गए हैं। यह सुनकर हिरण्याक्ष तुरंत उसी स्थान पर पहुँच गया क्योंकि उसने ही पृथ्वी को समुद्र में छिपाया था। वहाँ पहुँचकर हिरण्याक्ष ने देखा कि भगवान विष्णु वराह रूप धारण करके पृथ्वी को समुद्र से बाहर निकाल रहे हैं। इसके बाद हिरण्याक्ष और भगवान वराह के बीच घोर युद्ध छिड़ गया। भगवान विष्णु ने अपने दाँतों और जबड़ों से हिरण्याक्ष का पेट फाड़ दिया और पृथ्वी को वापस उसके स्थान पर रख दिया।
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