धर्म-अध्यात्म

धर्म: शादियों में तोरण मारण की परंपरा क्यों निभाई जाती है,भगवान शिव से इसका क्या संबंध है

Sarita
26 July 2025 9:57 AM IST
धर्म: शादियों में तोरण मारण की परंपरा क्यों निभाई जाती है,भगवान शिव से इसका क्या संबंध है
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धर्म: कई हिंदू शादियों में तोरण मारने की प्रथा सदियों से चली आ रही है। इस प्रथा में दूल्हा, दुल्हन के दरवाजे पर लटके तोरण पर तलवार से प्रहार करता है और फिर द्वार में प्रवेश करता है। भारत के कई राज्यों में इसे विवाह की एक प्रथा माना जाता है।
शादी में लटकाए गए इन तोरणों पर तोते का प्रतीक बना होता है। तोरण पर विशेष रूप से तोते का प्रतीक क्यों बनाया जाता है और यह परंपरा कैसे और क्यों शुरू हुई? यह सवाल मन में ज़रूर आता है। इस रस्म के पीछे एक पौराणिक कथा कही जाती है।
तोरण मारने की परंपरा कैसे शुरू हुई?
प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, तोरण नाम का एक राक्षस था, जो विवाह के समय तोते का रूप धारण करके दुल्हन के घर के द्वार पर बैठ जाता था। जब दूल्हा द्वार पर आता था, तो वह उसके शरीर में प्रवेश करके दुल्हन से विवाह कर लेता था। इसके बाद, वह जीवन भर दंपत्ति को परेशान करता रहता था।
एक बार एक वीर और चतुर राजकुमार को इस रहस्य का पता चला। विवाह के दौरान जब राजकुमार दुल्हन के घर में दाखिल हुआ, तो उसने अचानक राक्षस तोते को देखा और उसे तुरंत अपनी तलवार से मार डाला और विवाह संपन्न कराया। कहा जाता है कि उसी दिन से तोरण तोड़ने की परंपरा शुरू हुई।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, तोरण पर एक तोता बनाया जाता है।
इस रस्म में, दुल्हन के घर के द्वार पर एक लकड़ी का तोरण लगाया जाता है, जिस पर एक तोता बना होता है, जिसे उसी तोरण राक्षस का प्रतीक माना जाता है। विवाह के समय, दूल्हा तलवार से उस लकड़ी से बने राक्षस रूपी तोते को मारने की रस्म पूरी करता है।
कुछ मान्यताओं में, इस तोरण को राक्षसों और विपत्तियों से जोड़ा जाता है और दूल्हे को शिव का प्रतीक माना जाता है। इस प्रथा के माध्यम से, यह माना जाता है कि भगवान शिव विवाह से पहले सभी विपत्तियों का नाश कर रहे हैं।
तोरण की इस प्रथा से कई कहानियाँ और मान्यताएँ जुड़ी हैं। यही कारण है कि विवाह समारोह में यह प्रथा जारी है।
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