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धर्म-अध्यात्म
धर्म: संतान सप्तमी 2025, जानें महत्व, तिथि और शुभ मुहूर्त
Sarita
16 Aug 2025 9:52 AM IST

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धर्म: संतान सप्तमी 2025: हिंदू पंचांग में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को संतान सप्तमी कहा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से आप अपनी संतान के जीवन से संकट दूर कर सकते हैं। संतान सप्तमी व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को रखा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से संतान की प्रसन्नता, उनकी दीर्घायु और उज्ज्वल भविष्य के लिए रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से व्रत करने से संतान का स्वास्थ्य, सौभाग्य और जीवन खुशियों से भर जाता है।
संतान सप्तमी व्रत आस्था, भक्ति और प्रेम का प्रतीक है। सही विधि से व्रत रखने से संतान सुख, सुखी जीवन और पारिवारिक समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। संतान सप्तमी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि माता-पिता के अपनी संतान के प्रति प्रेम और चिंता का प्रतीक है। भक्ति और विश्वास के साथ किया गया यह व्रत संतान को दीर्घायु, स्वास्थ्य और सुखी जीवन प्रदान करता है।
संतान सप्तमी 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त:
तिथि: 30 अगस्त 2025, शनिवार
सप्तमी तिथि प्रारंभ: 29 अगस्त, रात्रि 8:25 बजे
सप्तमी तिथि समाप्ति: 30 अगस्त, रात्रि 10:46 बजे
पूजा का शुभ मुहूर्त: सुबह 11:05 बजे से दोपहर 12:47 बजे तक
इस दिन सूर्योदय के समय स्नान-ध्यान के बाद व्रत का संकल्प लें और पूजा में शिव-पार्वती के साथ भगवान कृष्ण का ध्यान करें।
व्रत का महत्व:
संतान सप्तमी व्रत का सीधा संबंध संतान की रक्षा और उन्नति से है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत को करने से माता-पिता की गोद कभी सूनी नहीं रहती। विवाहित जोड़े संतान प्राप्ति के लिए और माता-पिता संतान की दीर्घायु के लिए यह व्रत रखते हैं।
पूजा विधि:
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
पूजा स्थल पर भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति स्थापित करें।
घर के पूजा स्थल पर भगवान सूर्य की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
भगवान सूर्य को अर्घ्य दें और सप्त धान्य, लाल पुष्प, अक्षत अर्पित करें।
माता सप्तमातृका की पूजा करें।
चंदन, अक्षत, पुष्प, दीप, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
संतान सप्तमी व्रत कथा सुनें और संतान सुख की कामना करें।
शाम को सूर्यास्त के बाद व्रत खोलें।
व्रत पूरा होने के बाद किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन और वस्त्र दान करें।
पौराणिक कथा:
कथा के अनुसार, एक बार राजा की पत्नी के सात बच्चे हुए, लेकिन सभी की अल्पायु में ही मृत्यु हो गई। दुखी होकर रानी ने एक संत से उपाय पूछा। संत ने उन्हें भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को माता सप्तमातृका का व्रत करने की सलाह दी। रानी ने पूरी श्रद्धा से व्रत रखा, जिसके बाद उन्हें एक स्वस्थ और दीर्घायु पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से यह व्रत संतान की रक्षा और आयु वृद्धि के लिए किया जाने लगा।
ज्योतिषीय मान्यता:
ज्योतिष शास्त्र में सप्तमी तिथि को सूर्य देव को समर्पित माना जाता है। सूर्य जीवन और आरोग्य के देवता हैं, इसलिए इस दिन व्रत और पूजा करने से नकारात्मक ग्रह दोष शांत होते हैं और संतान के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह व्रत उन लोगों के लिए विशेष फलदायी है जिनकी कुंडली में पितृ दोष हो या संतान सुख में बाधा आ रही हो।
संतान सप्तमी के दिन पीपल के वृक्ष पर जल चढ़ाएँ और संतान की दीर्घायु की कामना करें।
छोटे बच्चों को भोजन कराएँ और उन्हें लाल वस्त्र भेंट करें।
सूर्य देव को गुड़ और गेहूँ का भोग लगाएँ।
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