धर्म-अध्यात्म

धर्म: कुंडली में शुक्र ग्रह को मजबूत करने के लिए शुक्रवार को करें ये उपाय

Sarita
4 July 2025 9:53 AM IST
धर्म: कुंडली में शुक्र ग्रह को मजबूत करने के लिए शुक्रवार को करें ये उपाय
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धर्म: ज्योतिष शास्त्र में मौजूद सभी ग्रह अपने विशेष प्रभाव और स्थिति के लिए जाने जाते हैं। इन सभी के योग से व्यक्ति को जीवन में शुभ-अशुभ परिणाम प्राप्त होते हैं। इस दौरान सूर्य को ग्रहों का राजा और बुध को सेनापति कहा जाता है। इसी तरह शुक्र को सबसे शुभ ग्रह माना जाता है। शुक्र मुख्य रूप से प्रेम, कला, धन, सुख, सौभाग्य और विलासिता का ग्रह है। कुंडली में इसकी शुभ स्थिति व्यक्ति के भौतिक सुखों में वृद्धि करती है और कला का विकास करती है। इसके अलावा शुक्र के प्रभाव से व्यक्ति का आकर्षण भी बढ़ता है। लेकिन अगर स्थिति ठीक न हो तो अक्सर लव लाइफ में परेशानियां और बिजनेस में धन हानि होती है। ऐसे में आप इन खास उपायों के जरिए कुंडली में शुक्र की स्थिति को मजबूत कर सकते हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में।
ज्योतिषियों के मुताबिक शुक्र मजबूत करने के लिए शुक्रवार को मां लक्ष्मी की पूजा करें। इसके अलावा इस दिन आप व्रत भी रखें। कहा जाता है कि लगातार 11 शुक्रवार के उपवास करने पर कुंडली में शुक्र की स्थिति मजबूत होती है।
शुक्रवार के दिन आप सफेद कपड़े, चीनी, चावल, घी, मिश्री, दही आदि का दान करें। यह शुक्र को प्रबल बनाने का सबसे सरल उपाय माना जाता है।
शुक्रवार के दिन आप सफेद या गुलाबी रंग के वस्त्र धारण करें। यह शुक्र के प्रिय रंगों में से एक माने जाते हैं।
ज्योतिषियों के अनुसार रोजाना पूजा के समय इन मंत्र का जप करें। इससे कुंडली में शुक्र ग्रह मजबूत होता है।
हिमकुंद मृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम्। सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम्।।
आप गाय को रोज सुबह रोटी खिलाएं। इसके अलावा महिलाओं का सम्मान करें। इसके प्रभाव से भी कुंडली में शुक्र ग्रह मजबूत होता है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार मां लक्ष्मी की पूजा के साथ-साथ उनकी चालीसा का पाठ करने से शुक्र ग्रह और देवी दोनों की कृपा प्राप्त होती है। आप यहां सभी इस चालीसा का पाठ कर सकते हैं-
श्री लक्ष्मी चालीसा:
॥ दोहा ॥
मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में वास।
मनोकामना सिद्ध कर पुरवहु मेरी आस॥
सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार।
ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार॥
श्री लक्ष्मी चालीसा
तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
जय जय जगत जननि जगदंबा सबकी तुम ही हो अवलंबा॥1॥
तुम ही हो सब घट घट वासी। विनती यही हमारी खासी॥
जगजननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥2॥
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी॥
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥3॥
कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी। जगजननी विनती सुन मोरी॥
ज्ञान बुद्घि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥4॥
क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥
चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥5॥
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रुप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥6॥
तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
अपनाया तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥7॥
तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी। कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥
मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन इच्छित वांछित फल पाई॥8॥
तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मनलाई॥
और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करै मन लाई॥9॥
ताको कोई कष्ट नोई। मन इच्छित पावै फल सोई॥
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी॥10॥
जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै। ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥
ताकौ कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥11॥
पुत्रहीन अरु संपति हीना। अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥
विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥12॥
पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥13॥
बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
प्रतिदिन पाठ करै मन माही। उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं॥14॥
बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
करि विश्वास करै व्रत नेमा। होय सिद्घ उपजै उर प्रेमा॥15॥
जय जय जय लक्ष्मी भवानी। सब में व्यापित हो गुण खानी॥
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं॥16॥
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥
भूल चूक करि क्षमा हमारी। दर्शन दजै दशा निहारी॥17॥
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी। तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्घि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥18॥
रुप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्घि मोहि नहिं अधिकाई॥19॥
त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास। जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश॥
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर। मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥
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