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धर्म-अध्यात्म
Radha Ashtami 2025 Vrat Katha: राधा अष्टमी आज, जानें इस दिन का महत्व और व्रत कथा
Sarita
31 Aug 2025 8:09 AM IST

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Radha Ashtami 2025 Vrat Katha: हिंदू धर्म में हर त्योहार और पर्व का विशेष महत्व है. साल 2025 में राधा अष्टमी का पर्व आज यानी 31 अगस्त को मनाया जा रहा है. भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. इस पर्व को राधाष्टमी और राधा जयंती के नाम से भी जाना जाता है. इस व्रत को करने से श्री कृष्ण और राधा रानी की कृपा प्राप्त होती है. यहां पढ़ें व्रत की संपूर्ण कथा|
राधा अष्टमी व्रत कथा:
ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा के अनुसार श्रीकृष्ण भक्ति के अवतार देवर्षि नारद ने एक बार भगवान सदाशिव के श्री चरणों में प्रणाम करके पूछा हे महाभाग ! मैं आपका दास हूं. बताइए, श्री राधा देवी लक्ष्मी हैं या देवपत्नी. महालक्ष्मी हैं या सरस्वती हैं? क्या वे अंतरंग विद्या हैं या वैष्णवी प्रकृति हैं? कहिए, वे वेदकन्या हैं, देवकन्या हैं अथवा मुनिकन्या हैं? नारद जी की बात सुनकर सदाशिव बोले हे मुनिवर ! एक मुंह से मैं अधिक क्या कहूं? मैं तो श्री राधा के रूप, लावण्य और गुण आदि का वर्णन करने मे अपने को असमर्थ पाता हूं. उनके रूप आदि की महिमा कहने में भी लज्जित हो रहा हूं. तीनों लोकों में कोई भी ऐसा समर्थ नहीं है जो उनके रूपादि का वर्णन करके पार पा सके. उनकी रूपमाधुरी जगत को मोहने वाले श्रीकृष्ण को भी मोहित करने वाली है. यदि अनंत मुख से चाहूं तो भी उनका वर्णन करने की मुझमें क्षमता नहीं है|
नारदजी बोले हे प्रभो श्री राधिकाजी के जन्म का माहात्म्य सब प्रकार से श्रेष्ठ है. हे भक्तवत्सल ! उसको मैं सुनना चाहता हूं. हे महाभाग ! सब व्रतों में श्रेष्ठ व्रत श्री राधाष्टमी के विषय में मुझको सुनाइए. श्री राधाजी का ध्यान कैसे किया जाता है? उनकी पूजा अथवा स्तुति किस प्रकार होती है? यह सब सुझसे कहिए. हे सदाशिव! उनकी चर्या, पूजा विधान तथा अर्चन विशेष सब कुछ मैं सुनना चाहता हूं. आप बतलाने की कृपा करें. शिवजी बोले वृषभानुपुरी के राजा वृषभानु महान उदार थे. वे महान कुल में उत्पन्न हुए तथा सब शास्त्रों के ज्ञाता थे|
अणिमा-महिमा आदि आठों प्रकार की सिद्धियों से युक्त, श्रीमान्, धनी और उदारचेत्ता थे. वे संयमी, कुलीन, सद्विचार से युक्त तथा श्री कृष्ण के आराधक थे. उनकी भार्या श्रीमती श्रीकीर्तिदा थीं. वे रूप-यौवन से संपन्न थीं और महान राजकुल में उत्पन्न हुई थीं. महालक्ष्मी के समान भव्य रूप वाली और परम सुंदरी थीं. वे सर्वविद्याओं और गुणों से युक्त, कृष्णस्वरूपा तथा महापतिव्रता थीं. उनके ही गर्भ में शुभदा भाद्रपद की शुक्लाष्टमी को मध्याह्न काल में श्रीवृन्दावनेश्वरी श्री राधिकाजी प्रकट हुईं|
“हे महाभाग ! अब मुझसे श्री राधाजन्म- महोत्सव में जो भजन-पूजन, अनुष्ठान आदि कर्तव्य हैं, उन्हें सुनिए. सदा श्रीराधाजन्माष्टमी के दिन व्रत रखकर उनकी पूजा करनी चाहिए. श्री राधाकृष्ण के मंदिर में ध्वजा, पुष्पमाल्य, वस्त्र, पताका, तोरणादि नाना प्रकार के मंगल द्रव्यों से यथाविधि पूजा करनी चाहिए. स्तुतिपूर्वक सुवासित गंध, पुष्प, धूपादि से सुगंधित करके उस मंदिर के बीच में पांच रंग के चूर्ण से मंडप बनाकर उसके भीतर षोडश दल के आकार का कमलयंत्र बनाएं. उस कमल के मध्य में दिव्यासन पर श्री राधाकृष्ण की युगलमूर्ति पश्चिमाभिमुख स्थापित करके ध्यान, पाद्य-अघ्र्यादि से क्रमपूर्वक भलीभांति उपासना करके भक्तों के साथ अपनी शक्ति के अनुसार पूजा की सामग्री लेकर भक्तिपूर्वक सदा संयतचित्त होकर उनकी पूजा करें|
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