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धर्म-अध्यात्म
Premanand Maharaj: प्रेमानंद महाराज ने बताया कर्म और विवेक का गहरा रहस्य
Sarita
20 Jan 2026 11:18 AM IST

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Premanand Maharaj: सोशल मीडिया पर इन दिनों वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में उन्होंने भगवान, कर्म और मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा को लेकर उठने वाले एक बेहद सामान्य लेकिन गहरे प्रश्न का उत्तर दिया है। यह वही सवाल है जो कभी न कभी हर व्यक्ति के मन में आता है अगर भगवान सर्वशक्तिमान हैं, तो वे हमें गलत कर्म करने से स्वयं क्यों नहीं रोकते?
भक्त की जिज्ञासा: भगवान होते हुए भी बुराई क्यों?
प्रेमानंद महाराज के पास आए एक भक्त ने अपनी दुविधा व्यक्त करते हुए पूछा, “महाराज जी, आप कहते हैं कि हम सभी परमात्मा के अंश हैं और भगवान हमारे पिता हैं। फिर जब वे जानते हैं कि हम गलत रास्ते पर जा रहे हैं, तो वे हमें पकड़कर रोक क्यों नहीं लेते?”
यह प्रश्न केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि हर उस इंसान का है जो जीवन में दुख, अन्याय और बुराई देखकर ईश्वर पर प्रश्न उठाता है।
प्रेमानंद महाराज का उत्तर: साधन भगवान देते हैं, चुनाव मनुष्य करता है
इस प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रेमानंद महाराज ने एक सरल लेकिन गहरी मिसाल दी।
उन्होंने कहा, “मान लीजिए किसी ने आपको ₹100 देकर बाजार भेजा। अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप उस पैसे से फल-मिठाई खरीदें या जुआ-शराब में उड़ा दें। पैसे देने वाले ने आपको केवल साधन दिया है, उसका उपयोग कैसे करना है, यह आपका निर्णय है।”
महाराज के अनुसार, भगवान भी मनुष्य को साधन देते हैं, लेकिन उनका उपयोग कैसे करना है, यह मनुष्य की जिम्मेदारी है।
विवेक: ईश्वर का दिया सबसे बड़ा वरदान
प्रेमानंद महाराज बताते हैं कि भगवान ने मनुष्य को केवल शरीर नहीं, बल्कि विवेक (सोचने-समझने की शक्ति) दी है।
यही विवेक मनुष्य का असली मार्गदर्शक है।
वाणी का चयन: भगवान ने बोलने की शक्ति दी है। अब यह मनुष्य पर निर्भर है कि वह उसी मुख से गाली दे या “राम-राम” और “राधा-राधा” का स्मरण करे।
इंद्रियों का उपयोग: आंखें मिली हैं—उनसे अश्लीलता देखी जा सकती है या प्रभु के दर्शन किए जा सकते हैं।
हाथों का कर्म: हाथों से किसी को कष्ट भी दिया जा सकता है और किसी की सहायता भी।
मनुष्य जन्म का वास्तविक उद्देश्य
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, मनुष्य जन्म हमें कर्म सुधारने और आत्मिक उन्नति के लिए मिला है। भगवान ने हमें कर्म की स्वतंत्रता (Free Will) दी है। अगर ईश्वर हर गलत कर्म से पहले हमें जबरन रोकने लगें, तो फिर पाप और पुण्य का अर्थ समाप्त हो जाएगा।
कर्मफल का सिद्धांत निरर्थक हो जाएगा इसीलिए भगवान मनुष्य को रोबोट की तरह नियंत्रित नहीं करते। अंतरात्मा की आवाज ही ईश्वर की चेतावनी है।
महाराज बताते हैं कि हर गलत काम से पहले मन के भीतर एक आवाज उठती है, जो हमें रोकती है। इसे ही हम अंतरात्मा की आवाज कहते हैं। यही वास्तव में भगवान का संकेत है। यदि मनुष्य उस आवाज को अनसुना करता है, तो वह उसकी इच्छाशक्ति की कमजोरी है, न कि भगवान की अनुपस्थिति।
निष्कर्ष: भगवान रास्ता दिखाते हैं, चलना हमें होता है। प्रेमानंद महाराज का स्पष्ट संदेश है कि भगवान मनुष्य को सही-गलत की पहचान देते हैं। साधन, विवेक और चेतावनी देते हैं लेकिन अंतिम निर्णय मनुष्य का होता है। भगवान रास्ता दिखाते हैं, पर उस रास्ते पर चलना या भटकना पूरी तरह मनुष्य के हाथ में है।
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