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Pradosh Vrat: अप्रैल में कब मनाया जाएगा शुक्र प्रदोष व्रत, जानें तिथि और महादेव की पूजा विधि

Sarita
19 April 2025 6:47 AM IST
Pradosh Vrat: अप्रैल में कब मनाया जाएगा शुक्र प्रदोष व्रत, जानें तिथि और महादेव की पूजा विधि
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Pradosh Vrat: हिंदू धर्म में महादेव की पूजा का विशेष महत्व माना गया है। इसके प्रभाव से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, साथ ही मन से सभी तरह के डर भय भी दूर होते हैं। लेकिन महाकाल की विशेष कृपा पाने के लिए प्रदोष व्रत का दिन सबसे उत्तम है। मान्यता है कि इस दिन की गई उपासना से शिव परिवार का आशीर्वाद मिलता है और सभी संकट टल जाते हैं। यह व्रत हर महीने के कृष्ण व शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर रखा जाता है। इस तिथि पर यदि सच्चे भाव से भगवान शिव को खीर का भोग व बेलपत्र अर्पित किया जाए, तो मनचाहा वर पाने की कामना पूर्ण होती हैं। वर्तमान में वैशाख माह जारी है और इस महीने में यह व्रत 25 अप्रैल 2025 को रखा जाएगा। ऐसे में आइए इस दिन की पूजा विधि और शुभ मुहूर्त के बारे में विस्तार से जानते हैं|
प्रदोष व्रत तिथि
इस बार वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 25 अप्रैल को सुबह 11: 44 मिनट पर होगी। इस तिथि का समापन 26 अप्रैल के दिन सुबह 8 बजकर 27 मिनट पर है। उदया तिथि के मुताबिक 25 अप्रैल 2025 को वैशाख माह का पहला प्रदोष व्रत रखा जाएगा। इस दिन शुक्रवार होने के कारण इसे शुक्र प्रदोष कहा जाएगा।
पूजा का शुभ मुहूर्त
25 अप्रैल 2025 शुक्र प्रदोष व्रत के दिन महादेव की पूजा के लिए शाम 6 बजकर 53 मिनट से लेकर रात 9 बजकर 3 मिनट तक का शुभ मुहूर्त बन रहा है। आप इस अवधि में महाकाल की उपासना कर सकते हैं।
प्रदोष व्रत पूजा के लिए सबसे पहले पूजा स्थल पर शिवलिंग स्थापित करें।
इसके बाद शिवलिंग पर जल चढ़ाएं।
अब आप बेलपत्र, फूल, गुड़हल के फूल और कुछ फल अर्पित करें।
इस दौरान आप महादेव को मिठाई का भोग भी लगा सकते हैं।
इसके बाद शुक्र प्रदोष व्रत की कथा का पाठ करें।
भगवान शिव की आरती करें।
इस दौरान आप महादेव के साथ-साथ पूरे शिव परिवार की आरती भी कर सकते हैं।
अंत में सुख-समृद्धि की कामना करते हुए गलतियों की क्षमा मांगे।
भगवान शिव की आरती
जय शिव ओंकारा ऊँ जय शिव ओंकारा ।
ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्द्धांगी धारा ॥
ऊँ जय शिव...॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥
ऊँ जय शिव...॥
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
त्रिगुण रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे॥
ऊँ जय शिव...॥
अक्षमाला बनमाला रुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी॥
ऊँ जय शिव...॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥
ऊँ जय शिव...॥
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता ।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥
ऊँ जय शिव...॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥
ऊँ जय शिव...॥
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी॥
ऊँ जय शिव...॥
त्रिगुण शिवजीकी आरती जो कोई नर गावे ।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे॥
ऊँ जय शिव...॥
जय शिव ओंकारा हर ऊँ शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अद्धांगी धारा॥ ऊँ जय शिव ओंकारा...॥
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