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धर्म-अध्यात्म
Pradosh Vrat 2025: प्रदोष व्रत के दिन पूजा के दौरान करें ये कथा का पाठ, दांपत्य जीवन होगा सुखमय
Sarita
11 March 2025 7:20 AM IST

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Pradosh Vrat 2025: हिंदू धर्म में त्रयोदशी तिथि बड़ी पावन मानी गई है. त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत रखा जाता है. हर माह कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत रखा जाता है. जिस दिन प्रदोष व्रत पड़ता है, उस दिन जो वार होता है उसी के नाम पर प्रदोष रखा जाता है. ये व्रत भगवान शिव को समर्पित किया गया है. प्रदोष व्रत के दिन प्रदोष काल में भगवान शिव का पूजन और उपवास करने से जीवन में खुशहाली आती है. इस दिन पूजा के समय प्रदोष व्रत की कथा भी अवश्य पढ़नी चाहिए. मान्यता है कि इससे वैवाहिक जीवन सुखी रहता है|
कल है प्रदोष व्रत
हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की त्रियोदशी तिथि की शुरुआत 11 मार्च यानी आज सुबह 8 बजकर 13 मिनट पर हो जाएगी. वहीं इस तिथि का समापन 12 मार्च को सुबह 9 बजकर 11 मिनट पर हो जाएगा. आज मंगलवार का दिन होने की वजह से भौम प्रदोष व्रत कहा जाएगा. भगवान शिव के पूजन का शुभ मुहूर्त शाम 6 बजकर 47 मिनट पर शुरू होगा. ये मुहूर्त रात 9 बजकर 11 मिनट पर खत्म हो जाएगा|
प्रदोष व्रत कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन समय में एक नगर में ब्रह्मण और ब्राह्मणी रहा करते थे. ब्राह्मण की मृत्यु हो जाने के बाद ब्राह्मणी बेसहारा हो गई. अपने पति की मौत के बाद जीवन यापन करने के लिए ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ भिक्षा मांगने लगी. एक दिन घर लौटते समय ब्राह्मणी ने लड़के को देखा. दरअसल, वो लड़का विदर्भ का राजकुमार था, जो अपनी पिता की मौत के बाद दर-दर भटक रहा था. ब्राह्मणी को उसपर दया आ गई और वो उसको अपने साथ ले आई.इसके बाद ब्राह्मणी उसका भी पालन-पोषण अपने पुत्र की तरह ही करने लगी. कुछ समय बाद वो अपने दोनों पुत्रों के साथ शांडिल्य ऋषि के आश्रम गईं, जहां उसने प्रदोष व्रत के बारे में जाना और अपने दोनों पुत्रों के साथ उसका पालन करने लगी. एक दिन ब्राह्मणी का पुत्र और राजकुमार वन में घूमने गए. वहीं वन में राजकुमार की मुलाकात गंधर्व कन्या अंशुमती से हुई. दोनों में प्रेम हो गया. इसके बाद जब राजुमार अंशुमती के माता-पिता से मिलने पहुंचा तो उन्होंने उसको पहचान लिया|
इसके बाद अंशुमती के माता-पिता ने ही पुत्री के विवाह का प्रस्ताव रखा. राजकुमार ने इस प्रस्ताव को स्वीकार लिया. इसके बाद अंशुमति और विदर्भ के राजकुमार का विवाह हो गया. इसके बाद राजकुमार को गंधर्वों की सहायता मिली, जिससे उसने विदर्भ पर आक्रमण कर अपना राज्य वापस हासिल कर लिया. फिर उसने ब्राह्मणी और उसके पुत्र को अपने राजमहल में बुलाया और उनका आदर सत्कार किया. कुछ समय बाद उसकी पत्नि अंशुमती ने उससे उसके जीवन के बारे में पूछा. तब उसने अपने मुश्किल समय और प्रदोष व्रत की महिमा के बारे में बताया, जिसकी वजह से उसके जीवन के सारे दुख दूर हो गए|
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