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Pauranik Katha: जानें सूर्य पुत्र की रोचक कथा

Sarita
22 Nov 2025 11:14 AM IST
Pauranik Katha: जानें सूर्य पुत्र की रोचक कथा
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Pauranik Katha: पौराणिक कथाओं में कई कई बार ऋषि व मुनियों द्वारा श्राप देने की घटना सामने आती है. ऋषियों ने मनुष्यों, राक्षसों और देवी-देवताओं को भी श्राप दिया लेकिन क्या आप जानते हैं कि मृत्यु के देवता यमराज भी ऋषि श्राप से बच नहीं पाएं. श्राप की एक ऐसी ही एक रोचक कथा आज के इस कड़ी में जानेंगे जिसे सूर्य पुत्र यमराज को झेलनी पड़ी और यमपुरी का त्याग कर पृथ्वी लोग में आना पड़ा|
यमराज की कथा:
पौराणिक कथा है कि ऋषि मैत्रेय ने विदुर की शंका का समाधान किया और उन्हें विस्तार पूर्वक बताया कि वे वास्तव में यमराज है जो मांडव्य ऋषि के श्राप के प्रकोप से पृथ्वी पर मनुष्य योनि में दासी-पुत्र के रूप में जन्में. विदुर ने श्राप के बारे में विस्तार से बताने को कहा, तब ऋषि ने बताना शुरू किया. ऋषि मैत्रेय ने बताया कि एक बार कुछ चोरों ने एक राजा के राजकोष से धन चुरा लिया और सिपाहियों से बचकर भागने लगें. सिपाहियों ने चोरों ओर चारों की खोज की. तब चोर स्वयं को बचाने के लिए वन की ओर निकल पड़े और रास्ते में मांडव्य ऋषि का आश्रम पड़ने पर धन को उसी आश्रम में फेंककर भाग निकले|
वहीं दूसरी सैनिक चोरों का पीछा करते हुए मांडव्य ऋषि के उसी आश्रम में जा पहुंचे जहां पर चोरों ने चुराया धन फेंका था. जांच करने पर सिपाहियों ने चोरी का धन उसी आश्रम से पाया और ऋषि को ही चोर मान लिया और राजा के सामने उन्हें पकड़कर ले गए. राजा ने सैनिकों की बातों को सुना और उसी आधार पर ऋषि को फांसी की सजा सुनाई. लेकिन सबकुछ इतना सरल नहीं था. आगे हुआ ये कि जब ऋषि को फांसी दी जा रही थी तब ऋषि मंत्र जाप कर रहे थे. ऐसे में हुआ ये कि उन्हें फांसी पर तो लटकाया गया लेकिन उनके प्राण नहीं निकल पाए. इस बारे में जब राजा को जानकारी हुई तो उन्हें अपनी भूल का पछतावा हुआ और वे उन्होंने ऋषि से क्षमा मांगी. इस पर ऋषि ने कहा कि राजा मैं तुम्हें क्षमा करता हूं लेकिन एक निरपराधी को मृत्यु दंड देने के लिए यमराज को मैं क्षमा नहीं करूंगा|
यमराज को अवश्य दंड दूंगा. इसी सोच के साथ ऋषि अपने तपोबल से सीधे यमराज की सभा में गए और यमराज से सटीक प्रश्न किया कि मैंने कोई अपराध नहीं किया तो मृत्य दंड का कष्ट मुझे क्यों भोगना पड़ गया? यमराज ने ऋषि को उत्तर दिया कि बचपन में एक तितली को आपने कांटा चुभाया था. जिसका पाप आपको भोगना पड़ता है. मांडव्य ऋषि ने इस पर यमराज से कहा कि शास्त्र अनुसार मनुष्य अनजाने में पाप करे तो उसे स्वप्न में दंड देने का नियम हैं लेकिन तुमने शास्त्र विरुद्ध मुझे कष्ट दिया है. इसके बाद क्रोध से तमतमाए मांडव्य ऋषि ने यमराज को श्राप दे दिया. उन्होंने कहा कि यमराज मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम मनुष्य योनि में एक दासी-पुत्र बनकर जन्म लोगे. अंत में मैत्रेय ऋषि ने विदुर से कहा कि यमराज तुमने उसी श्राप के प्रभाव से कुरु राजवंश में दासी के पुत्र विदुर रूप में जन्म लिया है|
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