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धर्म-अध्यात्म
Parivartini Ekadashi Vrat Katha: परिवर्तिनी एकादशी पर आज जरूर सुनें ये व्रत कथा, पूरे होंगे हर कार्य
Sarita
3 Sept 2025 7:46 AM IST

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Parivartini Ekadashi Vrat Katha: हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। यह तिथि प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को आती है और भगवान विष्णु को समर्पित है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधिवत पूजा-अर्चना के साथ व्रत करने से अत्यंत शुभ फल प्राप्त होते हैं। धार्मिक मान्यता है कि परिवर्तिनी एकादशी का व्रत रखने और विष्णु-लक्ष्मी की पूजा करने से सभी पापों का नाश होता है और भक्त को श्री हरि की असीम कृपा प्राप्त होती है।
परिवर्तिनी एकादशी 2025 की तिथि:
वैदिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष परिवर्तिनी एकादशी व्रत बुधवार, 3 सितंबर 2025 को मनाया जा रहा है। एकादशी तिथि 3 सितंबर को प्रातः 04:54 बजे प्रारंभ होगी और 4 सितंबर को प्रातः 04:22 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर यह व्रत 3 सितंबर को रखा जा रहा है। परिवर्तिनी एकादशी का व्रत रखने और कथा सुनने से शुभ फल प्राप्त होते हैं।
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का महत्व जानने के लिए अर्जुन ने भगवान कृष्ण से प्रश्न किया। तब कृष्ण ने कहा - "हे पार्थ! इस एकादशी की कथा सुनने मात्र से ही सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मनुष्य स्वर्ग का अधिकारी हो जाता है। इस दिन भगवान विष्णु शयन करते हुए करवट बदलते हैं, इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं।"
श्री कृष्ण ने आगे बताया कि त्रेता युग में बलि नामक एक दैत्य राजा था। वह बलवान, दानी और ब्राह्मणों का सम्मान करने वाला था। देवताओं का सिंहासन पाने की इच्छा से उसने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। यह देखकर देवराज इंद्र ने भगवान विष्णु से सहायता की प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु वामन रूप धारण करके राजा बलि के यज्ञ मंडप में पहुँचे और उनसे दान में तीन पग भूमि माँगी।
राजा बलि ने सहर्ष यह वचन दे दिया। वचन मिलते ही वामनदेव ने अपना आकार बढ़ा लिया और मात्र दो पग में ही संपूर्ण ब्रह्मांड नाप लिया। जब तीसरे पग के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तो उन्होंने बलि से पूछा - "अब मैं अपना तीसरा पग कहाँ रखूँ?" इस पर राजा बलि ने विनम्रतापूर्वक अपना सिर अर्पित कर दिया। उनकी उदारता और विनम्रता से प्रसन्न होकर वामनदेव ने अपना तीसरा पग उनके सिर पर रखकर उन्हें पाताल लोक भेज दिया।
वामनदेव ने उन्हें वरदान दिया कि वे सदैव बलि के साथ पाताल लोक में रहेंगे। तभी से मान्यता है कि परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु एक रूप में राजा बलि के साथ पाताल लोक में और दूसरे रूप में क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर विराजमान होते हैं। इस दिन वे शयन करते समय करवट भी बदलते हैं।
इस व्रत में भगवान विष्णु के साथ वामन अवतार की पूजा का भी विधान है। भक्त इस दिन दही, चावल और चांदी का दान करते हैं और पूरी रात जागरण करके भक्तिभाव से हरि का स्मरण करते हैं। ऐसा माना जाता है कि जो कोई भी व्यक्ति पूरी श्रद्धा के साथ परिवर्तिनी एकादशी का व्रत रखता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है और स्वर्ग को प्राप्त करता है।
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