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धर्म-अध्यात्म
Parivartini Ekadashi 2025: रवि योग में रखा जाएगा परिवर्तिनी एकादशी का व्रत, जानें महत्व और नियम
Sarita
2 Sept 2025 8:38 AM IST

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Parivartini Ekadashi 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं। इस वर्ष परिवर्तिनी एकादशी का व्रत विशेष योगों में आ रहा है। वर्ष 2025 में यह व्रत शुभ संयोग में रखा जाएगा, जिससे इसका महत्व और भी बढ़ गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से सभी पापों का नाश होता है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है। इस बार यह एकादशी आयुष्मान, सौभाग्य और रवि योग के शुभ संयोग में पड़ रही है, जिससे इसका महत्व कई गुना बढ़ गया है। आइए जानते हैं इस व्रत का महत्व, पूजा विधि और नियम।
परिवर्तिनी एकादशी 2025 कब है?
पंचांग के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी तिथि 3 सितंबर 2025 को प्रातः 3:53 बजे से प्रारंभ होगी और यह तिथि अगले दिन यानी 4 सितंबर 2025 को प्रातः 4:21 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी का व्रत 3 सितंबर को रखा जाएगा।
इन शुभ योगों में रखा जाएगा परिवर्तिनी एकादशी का व्रत!
आयुष्मान योग: यह योग दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करने वाला माना जाता है। इस योग में किए गए सभी शुभ कार्य सफल होते हैं।
सौभाग्य योग: यह योग सौभाग्य में वृद्धि करता है। इस योग में किया गया व्रत और पूजा वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनाए रखती है।
रवि योग: सूर्य देव से संबंधित यह योग अत्यंत प्रभावशाली होता है। इस योग में किए गए कार्य सभी प्रकार के कष्टों को दूर करते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं।
इस त्रिवेणी योग के कारण, परिवर्तिनी एकादशी का व्रत और पूजा करने से भक्तों को विशेष फल की प्राप्ति होगी।
व्रत नियम और पूजा विधि:
एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु के सामने हाथ जोड़कर व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल को साफ करें और भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। भगवान की मूर्ति को एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। उन्हें चंदन, रोली, अक्षत, पीले फूल, तुलसी के पत्ते और भोग (फल और मिठाई) अर्पित करें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। परिवर्तिनी एकादशी की व्रत कथा अवश्य सुनें या पढ़ें। हो सके तो रात्रि जागरण करें और भगवान विष्णु के भजन-कीर्तन करें। एकादशी का व्रत द्वादशी तिथि को किया जाता है। व्रत का समय अगले दिन सूर्योदय के बाद होता है।
परिवर्तिनी एकादशी का महत्व:
हिंदू धर्म में, एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है और इसका विशेष महत्व है। मान्यता है कि परिवर्तिनी एकादशी का व्रत करने से वाजपेय यज्ञ के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। इस व्रत को करने से जाने-अनजाने में किए गए पाप नष्ट हो जाते हैं और मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को इस एकादशी के महत्व के बारे में बताया था। राजा बलि को दिए वचन के अनुसार भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर उनसे तीन पग भूमि मांगी थी। भगवान वामन ने दो पग में धरती और स्वर्ग नाप लिया और तीसरा पग राजा बलि के सिर पर रखकर उन्हें पाताल लोक भेज दिया। इस घटना के बाद भगवान विष्णु ने राजा बलि को वरदान दिया था कि वे भाद्रपद शुक्ल एकादशी को उनके लोक में निवास करेंगे।
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