धर्म-अध्यात्म

जमशेदपुर में कांतारा थीम पर सजेगा काली पूजा पंडाल

Rajeshwari Nishad
7 Nov 2026 4:51 PM IST
जमशेदपुर में कांतारा थीम पर सजेगा काली पूजा पंडाल
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जमशेदपुर। झारखंड के जमशेदपुर में इस बार काली पूजा को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है। शहर के सोनारी स्थित सबुज संघ में दक्षिण भारतीय फिल्म 'कांतारा' की थीम पर भव्य काली पूजा पंडाल तैयार किया जा रहा है। इस पंडाल की सबसे बड़ी खासियत इसकी प्राकृतिक सजावट है। आयोजन समिति की ओर से पंडाल को इस तरह तैयार किया जा रहा है कि यहां प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं को प्रकृति के बीच पहुंचने का एहसास होगा। फिल्म की थीम और पारंपरिक धार्मिक आयोजन का यह अनोखा संगम लोगों के आकर्षण का केंद्र बनने की उम्मीद है।
काली पूजा के अवसर पर जमशेदपुर में हर साल विभिन्न पूजा समितियां आकर्षक पंडाल तैयार करती हैं। इनमें धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विषयों को विशेष महत्व दिया जाता है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सोनारी के सबुज संघ ने इस बार कुछ अलग करने की तैयारी की है। समिति ने लोकप्रिय दक्षिण भारतीय फिल्म 'कांतारा' से प्रेरणा लेकर पंडाल की सजावट में प्रकृति और पारंपरिक कला को प्रमुख स्थान दिया है।
कांतारा फिल्म की थीम पर तैयार हो रहा पंडाल
सबुज संघ का काली पूजा पंडाल इस बार अपने अनोखे स्वरूप को लेकर चर्चा में है। फिल्म 'कांतारा' में प्रकृति, लोक परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं को विशेष रूप से दर्शाया गया है। इसी अवधारणा को ध्यान में रखते हुए पंडाल का निर्माण किया जा रहा है।आयोजन समिति का प्रयास है कि श्रद्धालुओं को पंडाल में केवल धार्मिक सजावट ही नहीं, बल्कि एक अलग सांस्कृतिक अनुभव भी मिले।पंडाल के निर्माण में प्राकृतिक वातावरण का एहसास कराने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सजावट का उद्देश्य लोगों को प्रकृति के करीब लाना और पारंपरिक धार्मिक आयोजन को एक अलग पहचान देना है।यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को सामान्य पूजा पंडालों से अलग अनुभव मिलने की उम्मीद है।
प्राकृतिक सामग्रियों से की जा रही सजावट
इस पंडाल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी सजावट में प्राकृतिक सामग्रियों का इस्तेमाल किया जा रहा है।आमतौर पर बड़े पूजा पंडालों में थर्मोकोल, प्लास्टिक और अन्य कृत्रिम सजावटी वस्तुओं का इस्तेमाल देखने को मिलता है। लेकिन सबुज संघ ने प्राकृतिक सजावट को प्राथमिकता दी है।इससे पंडाल को पारंपरिक और पर्यावरण के अनुकूल स्वरूप देने का प्रयास किया जा रहा है।प्राकृतिक सामग्री से तैयार सजावट श्रद्धालुओं को आकर्षित करने के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दे सकती है।हालांकि, पंडाल निर्माण में किन-किन सामग्रियों का कितना उपयोग किया गया है, इसकी विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है।
प्रवेश करते ही मिलेगा प्रकृति के बीच होने का एहसास
आयोजन समिति पंडाल के प्रवेश द्वार से लेकर अंदरूनी सजावट तक प्राकृतिक वातावरण तैयार करने पर ध्यान दे रही है।इसका उद्देश्य है कि श्रद्धालु जैसे ही पंडाल में प्रवेश करें, उन्हें ऐसा महसूस हो कि वे किसी प्राकृतिक परिवेश में पहुंच गए हैं।सजावट में फिल्म की थीम से जुड़ी पारंपरिक और सांस्कृतिक झलक प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है।इस तरह का वातावरण पूजा पंडाल को केवल धार्मिक आयोजन स्थल तक सीमित नहीं रखता, बल्कि इसे कला और संस्कृति के प्रदर्शन का माध्यम भी बनाता है।विशेष रूप से बच्चों और युवाओं के लिए यह सजावट आकर्षण का केंद्र बन सकती है।
दुर्गा पूजा की तर्ज पर भव्य आयोजन
जमशेदपुर में दुर्गा पूजा के दौरान भव्य पंडालों की परंपरा लंबे समय से रही है। अलग-अलग पूजा समितियां हर साल नई थीम और अनोखी सजावट के माध्यम से श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं।अब काली पूजा में भी इसी तरह के भव्य आयोजन देखने को मिल रहे हैं।सोनारी स्थित सबुज संघ का यह प्रयास भी दुर्गा पूजा की थीम आधारित सजावट की परंपरा से प्रेरित है।पंडाल की भव्यता और अलग विषय के कारण इस बार यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद की जा सकती है।हालांकि, आयोजन समिति की ओर से श्रद्धालुओं की संभावित संख्या को लेकर कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
कांतारा फिल्म से क्यों ली गई प्रेरणा?
दक्षिण भारतीय फिल्म 'कांतारा' अपनी कहानी, लोक संस्कृति, प्रकृति और पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं के चित्रण के कारण चर्चित रही है।फिल्म में ग्रामीण जीवन, सांस्कृतिक परंपराओं और प्रकृति के साथ मानवीय संबंधों को प्रमुखता से दिखाया गया है।इसी वजह से फिल्म की थीम धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए भी प्रेरणादायक बन सकती है।सबुज संघ ने काली पूजा पंडाल में इसी प्राकृतिक और पारंपरिक वातावरण को प्रस्तुत करने की योजना बनाई है।फिल्म से प्रेरित
सजावट
के जरिए श्रद्धालुओं को एक अलग अनुभव देने का प्रयास किया जा रहा है।
पर्यावरण संरक्षण का भी मिलेगा संदेश
प्राकृतिक सामग्रियों का इस्तेमाल केवल सजावट का तरीका नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता भी बढ़ाई जा सकती है।धार्मिक आयोजनों में बड़ी मात्रा में सजावटी सामग्री का उपयोग होता है। यदि ऐसी सामग्री का चयन सावधानी से किया जाए, तो आयोजन के बाद निकलने वाले कचरे को कम करने में मदद मिल सकती है।प्राकृतिक और दोबारा इस्तेमाल की जा सकने वाली सामग्री इस दिशा में उपयोगी साबित हो सकती है।हालांकि, किसी पंडाल को पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल मानने के लिए सामग्री के स्रोत, निर्माण प्रक्रिया और आयोजन के बाद उसके निपटान पर भी ध्यान देना आवश्यक है।सबुज संघ का प्राकृतिक सजावट पर जोर इस विषय में लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकता है।
कला और धार्मिक आस्था का अनोखा संगम
काली पूजा धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण पर्व है। इस अवसर पर श्रद्धालु मां काली की पूजा-अर्चना कर सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।वहीं, थीम आधारित पंडाल धार्मिक आयोजन में कला और संस्कृति का नया आयाम जोड़ते हैं।सोनारी में तैयार हो रहा कांतारा थीम वाला पंडाल इसी का उदाहरण है।यहां धार्मिक आस्था के साथ फिल्म से प्रेरित कलात्मक प्रस्तुति और प्राकृतिक सजावट को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।इस तरह के आयोजन स्थानीय कलाकारों और सजावट से जुड़े कारीगरों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर भी प्रदान कर सकते हैं।
श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा पंडाल
जमशेदपुर के सोनारी में सबुज संघ की ओर से तैयार किया जा रहा यह काली पूजा पंडाल इस बार शहर के प्रमुख आकर्षणों में शामिल हो सकता है।प्राकृतिक सजावट, कांतारा फिल्म से प्रेरित थीम और पारंपरिक धार्मिक वातावरण इसे अन्य पंडालों से अलग पहचान देने की कोशिश है।आयोजन समिति का उद्देश्य श्रद्धालुओं को ऐसा अनुभव देना है, जिसमें धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति की सुंदरता का भी एहसास हो।काली पूजा के अवसर पर यहां पहुंचने वाले लोगों को भव्य सजावट देखने का अवसर मिलेगा।कुल मिलाकर, सबुज संघ का यह प्रयास दर्शाता है कि धार्मिक आयोजनों में पारंपरिक आस्था को बनाए रखते हुए नए और रचनात्मक विचारों को भी स्थान दिया जा सकता है। अब श्रद्धालुओं को इस अनोखे पंडाल के पूरी तरह तैयार होने का इंतजार है।
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