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पीढ़ियों से, हिमाचल प्रदेश ने उत्तरी भारत की थोक मंडियों में सेब के शुरुआती सीजन की शुरुआत करने में अहम भूमिका निभाई है। गर्मियों के आखिर और पतझड़ के महीनों में, शिमला जिले के प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्रों—जैसे कोटखाई, जुब्बल, रोहड़ू और कोटगढ़—के नाम वाले सेब के कार्टन शिमला से लेकर परवाणू और दिल्ली की आजादपुर मंडी तक पहुंचते थे। उस समय, जब सेब की सप्लाई कम और मांग ज्यादा होती थी, तो इन्हें बहुत अच्छी कीमत मिल जाती थी। लेकिन इस साल ऐसा नहीं हुआ। पिंजौर की थोक मंडी में, सुबह होने से पहले ही ट्रकों की कतारें लग जाती हैं। इन ट्रकों की नंबर प्लेट शिमला की पहाड़ियों की नहीं, बल्कि कश्मीर घाटी के दक्षिणी जिलों की हैं। पिंजौर में काम करने वाले एक आढ़ती और ट्रांसपोर्टर, रजत चौहान कहते हैं, "इस साल मंडियों में हिमाचल की शुरुआती किस्में, जैसे 'टाइडमैन' और शुरुआती 'शाडू' सेब, नदारद रहीं।"
चौहान आगे कहते हैं, "इस बीच, कश्मीर से गहरे रंग वाले और अच्छी तरह से छांटे गए (ग्रेडेड) शुरुआती सेब आने लगे। इनकी कीमतें इतनी कम थीं कि हिमाचल के किसान उनका मुकाबला नहीं कर पाए। जब कश्मीर का सेब जल्दी आ जाता है और बहुत कम कीमत पर बिक जाता है, तो कोई खरीदार हिमाचल के उन सेबों के लिए ज्यादा पैसे क्यों देगा, जो कम मात्रा में उपलब्ध हैं और जिन पर खराब मौसम के निशान भी हैं?"
शुरुआती सीजन में बढ़त
भारत का 7,000 करोड़ रुपये का घरेलू सेब व्यापार एक बड़े भौगोलिक और संरचनात्मक बदलाव से गुजर रहा है। हिमाचल में 6,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित बागों में, किसानों को हाल के वर्षों के सबसे खराब फसल सीजन का सामना करना पड़ रहा है।
दूसरी ओर, कश्मीर में पीर पंजाल पर्वतमाला के पार एक शांत तकनीकी क्रांति चल रही है। इसमें 'हाई-डेंसिटी रूटस्टॉक' (सघन बागवानी तकनीक), सरकार की ओर से दी जाने वाली भारी पूंजी सब्सिडी और कोल्ड-स्टोरेज लॉजिस्टिक्स का विस्तार शामिल है। इन सबने राष्ट्रीय बाजार में कश्मीर घाटी की पकड़ को और मजबूत कर दिया है। 'इंडियन एग्रीकल्चरल स्टैटिस्टिक्स रिसर्च इंस्टीट्यूट' के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 के सीजन में जम्मू-कश्मीर में 20.45 लाख टन सेब का उत्पादन हुआ, जबकि हिमाचल में यह आंकड़ा केवल 5.83 लाख टन रहा। इस सीजन में, यह अंतर और भी ज्यादा बढ़ गया है।
हिमाचल के बागवानी विभाग ने पहले ही उत्पादन में कुछ कमी आने का अनुमान लगाया था, जिसके तहत 4.36 लाख टन सेब पैदा होने की उम्मीद थी। फसल कटाई का काम पूरा होने वाला है, लेकिन अब तक केवल 1.37 करोड़ बक्से ही भेजे जा सके हैं। यह पिछले सीजन के 3.49 करोड़ बक्सों के मुकाबले 50 प्रतिशत के आंकड़े को भी पार नहीं कर पाया है।
परवानू स्थित 'एप्पल आढ़तिया एसोसिएशन' के महासचिव प्रदीप सिंह रेक्ता कहते हैं, "हम एक बड़ी गिरावट देख रहे हैं। फूल आने के समय तापमान काफी गिर गया था। सर्दियों में बर्फबारी बहुत कम हुई, जिससे पेड़ों को जरूरी 'चिलिंग आवर्स' (ठंड के घंटे) नहीं मिल पाए। इसके बाद बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और गर्मियों में उतार-चढ़ाव वाली गर्मी ने फसल की मात्रा और उसकी दिखावट (क्वालिटी) दोनों को बुरी तरह प्रभावित किया। फसल का एक बड़ा हिस्सा आकार में ठीक से विकसित ही नहीं हो पाया।"
हाई-डेंसिटी तकनीक का कमाल
दक्षिण और उत्तर कश्मीर के सेब उत्पादक इलाकों की तस्वीर अब पूरी तरह बदल रही है। बारामूला या शोपियां से गुजरते हुए आप देखेंगे कि पुराने, बहुत ऊंचे पेड़ - जिनके लिए कभी 40 फुट लंबी सीढ़ियों की जरूरत पड़ती थी - अब गायब हो रहे हैं।
इनकी जगह अब 'ट्रेलिस' (सहारे) के सहारे लगे छोटे कद वाले (ड्वार्फ) सेब के पेड़ों की कतारें दिखती हैं। ये पेड़ एक-दूसरे से कुछ ही मीटर की दूरी पर लगाए गए हैं और 8 साल के बजाय महज 3 साल में ही फल देने लगते हैं। शोपियां के बीचों-बीच स्थित पिंजूरा गांव में, शाहनवाज खान M9 रूटस्टॉक किस्मों के घने पेड़ों की कतारों के बीच चल रहे हैं। खान कहते हैं, "मैं अब पारंपरिक किस्मों की खेती नहीं करता। मैंने पूरी तरह से 'अल्ट्रा-हाई-डेंसिटी' M9 रूटस्टॉक को अपना लिया है। यह सीजन मेरे लिए अब तक का सबसे अच्छा रहा है। मंडियों में हमारे 'गाला' सेब के बक्से 2,000 से 2,500 रुपये तक बिके। यहां की जमीन हमें ड्रिप सिंचाई लगाने और पेड़ों के फैलाव (कैनोपी) को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने की सुविधा देती है।"
नई पीढ़ी की बागवानी में वापसी
यह बदलाव घाटी के उन हिस्सों में भी फायदेमंद साबित हो रहा है, जहां पहले ज्यादा तापमान सेब उत्पादकों के लिए एक चुनौती हुआ करता था। अनंतनाग के मरहामा गांव में, आदिल हुसैन मागरे बताते हैं कि नई 'हाई-डेंसिटी' और जल्दी पकने वाली किस्मों ने उनके बाग की आर्थिक स्थिति बदल दी है। वे कहते हैं, "मैंने 2021 में इन्हें लगाना शुरू किया था। इनसे हमें अच्छा मुनाफा मिल रहा है और मेरी फसल जुलाई में ही तैयार हो जाती है - उस समय जब बाजार में कोई और फल उपलब्ध नहीं होता।" उत्तर में बारामूला में, गुलाम अहमद पंडित उन बागों की देखभाल करते हैं, जिनसे उनके परिवार के लोगों को अपने करियर बनाने के लिए आर्थिक मदद मिली। वे कहते हैं, "कश्मीर में माहौल बदल रहा है। पढ़े-लिखे युवा, जो भारत के अलग-अलग शहरों में चले गए थे, अब वापस आकर अपने पारिवारिक बागों को संभाल रहे हैं। जब एक एकड़ के 'हाई-डेंसिटी' (सघन) बाग से अच्छा मुनाफा मिलता है, तो डेस्क जॉब के मुकाबले कृषि-व्यवसाय कहीं बेहतर लगता है। इसके अलावा, रूटस्टॉक और ट्रेलिस (पौधों के सहारे के ढांचे) पर सरकार की 50 प्रतिशत कैपिटल सब्सिडी मिलने से, दोबारा पौधे लगाने की शुरुआती दिक्कतें भी कम हो जाती हैं।"
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