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Jaya Ekadashi 2026: जया एकादशी आज, जानें मुहूर्त, पूजा विधि, मंत्र, कथा, आरती और व्रत पारण का समय

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न किया कि माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम क्या है, इस दिन किस देवता की पूजा करनी चाहिए और इस व्रत का क्या महत्व है। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया कि माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है। इसका व्रत करने से व्यक्ति को भूत, प्रेत और पिशाच जैसी नीच योनियों से मुक्ति मिलती है और वह भगवान विष्णु की विशेष कृपा का पात्र बनता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को जया एकादशी से जुड़ी एक कथा भी सुनाई। उन्होंने बताया कि स्वर्ग लोक में माल्यवान नाम का एक गंधर्व और पुष्यवती नाम की एक गंधर्व कन्या रहते थे। एक बार सभा में पुष्यवती मर्यादा भूलकर ऐसा नृत्य करने लगी जिससे माल्यवान उसकी ओर आकर्षित हो जाए। पुष्यवती के हाव-भाव को देखकर माल्यवान भी अपने गायन की मर्यादा भूल बैठा और सुर-ताल से भटक गया। दोनों अपनी भावनाओं में इतने लीन हो गए कि यह नहीं समझ पाए कि देवराज इंद्र उनके इस अनुचित व्यवहार से क्रोधित हो रहे हैं।
देवराज इंद्र ने उनके इस आचरण से क्रोधित होकर दोनों को नीच पिशाच योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। श्राप के प्रभाव से वे तुरंत पिशाच बन गए और हिमालय पर्वत पर एक वृक्ष के पास उनका निवास हो गया। पिशाच योनि में उन्हें अत्यधिक कष्ट, भूख और पीड़ा का सामना करना पड़ा और उनका जीवन अत्यंत दुखमय हो गया।
इसी दौरान माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि आई, जो जया एकादशी के नाम से जानी जाती है। उस दिन अज्ञानवश ही सही, लेकिन दोनों ने केवल फलाहार किया और रात्रि में अत्यधिक ठंड होने के कारण पूरी रात जागते रहे। उसी रात उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन चूंकि उन्होंने जया एकादशी का व्रत किया था, इसलिए उन्हें पिशाच योनि से मुक्ति मिल गई और वे दिव्य शरीर धारण कर स्वर्ग लोक पहुंच गए।
जब देवराज इंद्र ने उन्हें स्वर्ग में देखा तो वे अत्यंत आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने पूछा कि पिशाच योनि से उन्हें मुक्ति कैसे मिली। तब माल्यवान ने बताया कि यह सब भगवान विष्णु की जया एकादशी के प्रभाव से संभव हुआ है। जया एकादशी के व्रत और उसके पुण्य प्रभाव से ही उन्हें नीच योनि से छुटकारा मिला। यह सुनकर इंद्रदेव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि जो लोग जगदीश्वर भगवान विष्णु के भक्त होते हैं, वे सदैव आदरणीय होते हैं। इसके बाद उन्होंने दोनों को स्वर्ग में आनंदपूर्वक रहने का आशीर्वाद दिया।
विष्णु मंत्र:
ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु ।
यद्दीदयच्दवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।।
ॐ वासुदेवाय विघ्माहे वैधयाराजाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात् ||
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे अमृता कलसा हस्थाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात् ||
ॐ श्री विष्णवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
मङ्गलम् भगवान विष्णुः, मङ्गलम् गरुणध्वजः। मङ्गलम् पुण्डरी काक्षः, मङ्गलाय तनो हरिः॥
पद्मानने पद्म पद्माक्ष्मी पद्म संभवे तन्मे भजसि पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम्।
दन्ताभये चक्र दरो दधानं, कराग्रगस्वर्णघटं त्रिनेत्रम्। धृताब्जया लिंगितमब्धिपुत्रया, लक्ष्मी गणेशं कनकाभमीडे।।
ॐ ह्रीं श्री क्रीं क्लीं श्री लक्ष्मी मम गृहे धन पूरये, धन पूरये, चिंताएं दूरये-दूरये स्वाहा:
ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय नमः।
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय...॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय...॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय...॥
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय...॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय...॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय...॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय...॥
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय...॥
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय...॥





