धर्म-अध्यात्म

नवरात्रि की पूजा सामग्री का ऐसे करें विसर्जन

Rajeshwari Nishad
15 Oct 2026 1:04 PM IST
नवरात्रि की पूजा सामग्री का ऐसे करें विसर्जन
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Navratri Puja Samagri: शारदीय नवरात्रि हिंदू धर्म के प्रमुख और पवित्र त्योहारों में से एक है। इस दौरान नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु अपने घरों और मंदिरों में कलश स्थापना करते हैं, अखंड ज्योति जलाते हैं और माता रानी को फूल, माला, नारियल, चुनरी और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करते हैं। नवरात्रि के समापन के बाद विजयादशमी के अवसर पर माता की विदाई की परंपरा निभाई जाती है। लेकिन पूजा समाप्त होने के बाद अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि कलश में भरा जल, नारियल, फूल-माला, चुनरी और बोए गए जौ का क्या करना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूजा में इस्तेमाल की गई सामग्री को सम्मानपूर्वक रखना या उसका उचित विसर्जन करना चाहिए। अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी परंपराएं भी अलग हो सकती हैं।
नवरात्रि पूजा के बाद पूजन सामग्री का क्या करें?
नवरात्रि के दौरान माता रानी की पूजा में कई प्रकार की सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें कलश, नारियल, आम के पत्ते, फूल, चुनरी, अक्षत, रोली, जौ और अन्य वस्तुएं शामिल होती हैं।
धार्मिक मान्यताओं में पूजा के दौरान उपयोग की गई सामग्री को पवित्र माना जाता है। इसलिए पूजा समाप्त होने के बाद इसे सामान्य कचरे के साथ फेंकने से बचने की सलाह दी जाती है।श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपराओं के अनुसार कुछ सामग्री को सुरक्षित रखते हैं, जबकि फूल-पत्तियों जैसी जैविक सामग्री को मिट्टी में विसर्जित करते हैं।इस दौरान स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण का ध्यान रखना भी जरूरी है।
कलश के जल का ऐसे करें इस्तेमालनवरात्रि में कलश स्थापना का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कलश को शुभता, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।पूजा समाप्त होने के बाद कलश में भरे जल को सम्मानपूर्वक उपयोग में लाया जा सकता है।
कई परिवारों में इस जल को घर के सदस्यों पर छिड़कने की परंपरा है। ऐसा करना धार्मिक दृष्टि से शुभ माना जाता है।इसके अलावा कलश का जल तुलसी या अन्य पौधों की जड़ों में भी डाला जा सकता है, बशर्ते उसमें पौधों को नुकसान पहुंचाने वाली कोई सामग्री न मिली हो।ध्यान रखें कि कई दिनों तक रखे जल को बिना उसकी स्वच्छता सुनिश्चित किए पीना उचित नहीं है।
पूजा में चढ़ाए गए नारियल का क्या करें?
नवरात्रि के दौरान कलश पर नारियल स्थापित करने की परंपरा होती है। नारियल को शुभता और पूर्णता का प्रतीक माना जाता है।पूजा समाप्त होने के बाद श्रद्धालु नारियल को प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में बांट सकते हैं।
हालांकि, नारियल खाने से पहले उसकी स्थिति अच्छी तरह जांच लेनी चाहिए। अगर नारियल खराब हो गया है या उसमें फफूंद लग गई है, तो उसका सेवन नहीं करना चाहिए।कुछ परिवारों में कलश पर रखे नारियल को लाल या पीले कपड़े में लपेटकर पूजा स्थान पर सुरक्षित रखने की परंपरा भी है।नारियल के उपयोग को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों की धार्मिक मान्यताएं भिन्न हो सकती हैं।
नवरात्रि में बोए गए जौ का क्या करें?शारदीय नवरात्रि में घटस्थापना के दौरान मिट्टी में जौ बोने की परंपरा है। इसे ज्वारे या जवारे भी कहा जाता है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जौ का अंकुरित होना सुख-समृद्धि और शुभता से जोड़कर देखा जाता है।
नवरात्रि समाप्त होने के बाद कई परिवारों में अंकुरित जौ को पूजा के बाद सम्मानपूर्वक निकाला जाता है।कुछ स्थानों पर थोड़े से जौ को घर के पूजा स्थान में रखने की परंपरा है। वहीं शेष जौ को पौधों की जड़ों या मिट्टी में विसर्जित किया जा सकता है।यदि जौ के साथ मिट्टी भी हो, तो उसे किसी साफ स्थान पर पौधों के आसपास डालना एक पर्यावरण-अनुकूल तरीका है।जौ को प्लास्टिक की थैलियों में भरकर नदी या तालाब में फेंकने से बचना चाहिए।
माता रानी की चुनरी का क्या करें?
नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा को लाल या पीले रंग की चुनरी अर्पित की जाती है। धार्मिक परंपराओं में इसे श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक माना जाता है।पूजा समाप्त होने के बाद चुनरी को साफ करके सुरक्षित रखा जा सकता है।
कई श्रद्धालु माता की चुनरी को अपने घर के मंदिर में रखते हैं। कुछ परिवारों में अगली पूजा के दौरान इसका दोबारा उपयोग भी किया जाता है।यदि चुनरी साफ और अच्छी स्थिति में है, तो इसे किसी जरूरतमंद व्यक्ति को सम्मानपूर्वक दिया जा सकता है।ध्यान रखें कि सिंथेटिक कपड़ों या प्लास्टिक की सजावट वाली चुनरी को
जलस्रोतों
में प्रवाहित नहीं करना चाहिए।पूजा के फूल और माला का ऐसे करें विसर्जननवरात्रि के दौरान मां दुर्गा को विभिन्न प्रकार के फूल और मालाएं अर्पित की जाती हैं।
पूजा समाप्त होने के बाद मुरझाए हुए फूलों और मालाओं को इधर-उधर फेंकने के बजाय अलग इकट्ठा कर लेना चाहिए।इन फूलों को घर के बगीचे की मिट्टी में मिलाया जा सकता है। यदि फूलों में प्लास्टिक, धागे या अन्य कृत्रिम सामग्री लगी हो, तो पहले उन्हें अलग कर देना चाहिए।प्राकृतिक फूलों से जैविक खाद भी तैयार की जा सकती है।इस तरह पूजा सामग्री का सम्मान बनाए रखते हुए पर्यावरण को भी स्वच्छ रखा जा सकता है।
पूजा की सुपारी, सिक्के और अक्षत का क्या करें?
नवरात्रि पूजा में सुपारी, चावल यानी अक्षत और सिक्कों का भी इस्तेमाल किया जाता है।कई परिवारों में पूजा में रखे सिक्कों को साफ करके घर के मंदिर या धन रखने के स्थान पर सुरक्षित रखने की परंपरा है।सुपारी को भी कुछ श्रद्धालु अगली पूजा के लिए संभालकर रखते हैं।वहीं अक्षत यानी चावल को पारिवारिक मान्यताओं के अनुसार पूजा स्थान पर रखा जा सकता है या उचित तरीके से मिट्टी में विसर्जित किया जा सकता है।यदि चावल में रंग, रसायन या अन्य सामग्री मिली हो, तो उसे खाने में इस्तेमाल करने से बचना चाहिए।
अखंड ज्योति और पूजा के दीपक का क्या करें?नवरात्रि के दौरान कई घरों में नौ दिनों तक अखंड ज्योति जलाने की परंपरा होती है।पूजा समाप्त होने के बाद दीपक को सुरक्षित तरीके से जलने देना चाहिए। जलते हुए दीपक को पर्दों, कपड़ों और अन्य ज्वलनशील वस्तुओं से दूर रखना जरूरी है।
ज्योति बुझ जाने और दीपक पूरी तरह ठंडा होने के बाद उसकी सफाई की जा सकती है।मिट्टी या धातु के दीपकों को अगली पूजा के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है।बचे हुए तेल या घी का निपटान सावधानीपूर्वक करना चाहिए। इस्तेमाल किया गया तेल नालियों में नहीं डालना चाहिए।
नवरात्रि के बाद किन गलतियों से बचें?
नवरात्रि पूजा के बाद पूजन सामग्री का निपटान करते समय धार्मिक भावनाओं के साथ पर्यावरण की सुरक्षा का ध्यान रखना भी आवश्यक है।पूजा की सामग्री को प्लास्टिक की थैलियों सहित नदी, तालाब या अन्य जलस्रोतों में नहीं डालना चाहिए।अगर सामग्री में प्लास्टिक, थर्मोकोल या कृत्रिम सजावट मौजूद है, तो उसे अलग करके स्थानीय कचरा प्रबंधन व्यवस्था के अनुसार निपटाना बेहतर है।पूजा में इस्तेमाल की गई धातु की वस्तुओं, कलश और बर्तनों को साफ करके दोबारा
इस्तेमाल
किया जा सकता है।
श्रद्धा के साथ स्वच्छता का भी रखें ध्यान
नवरात्रि केवल पूजा-पाठ का त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन और सकारात्मक जीवन मूल्यों से जुड़ा उत्सव भी है।माता रानी की विदाई के बाद पूजन सामग्री को सम्मानपूर्वक संभालना श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं का हिस्सा है।हालांकि, अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में विसर्जन की परंपराएं भिन्न होती हैं। ऐसे में अपनी पारिवारिक परंपरा और स्थानीय रीति-रिवाजों का पालन किया जा सकता है।
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