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धर्म-अध्यात्म
Hariyali Teej 2025: इस दिन मनाई जाएगी हरियाली तीज, जानिए सही तारीख और शुभ मुहूर्त
Sarita
9 July 2025 7:44 AM IST

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Hariyali Teej 2025: भारत में मनाए जाने वाले व्रत-त्योहारों में हरियाली तीज का विशेष महत्व है। यह व्रत मुख्यतः महिलाओं द्वारा सुहाग की लंबी उम्र और वैवाहिक सुख की कामना के लिए रखा जाता है। सावन मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाने वाली यह तीज उत्तर भारत, खासकर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और हरियाणा में बड़े उत्साह के साथ मनाई जाती है। 2025 में हरियाली तीज की तिथि को लेकर लोगों में भ्रम की स्थिति है क्या यह 26 जुलाई को है या 27 जुलाई को ? आइए इस लेख में इस व्रत की सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में विस्तार से जानते हैं।
हरियाली तीज की तिथि:
तृतीया तिथि प्रारंभ: 26 जुलाई 2025 की रात 10 बजे
तृतीया तिथि समाप्त: 27 जुलाई 2025 को रात 10 बजकर 41 मिनट तक
उदया तिथि के अनुसार 27 जुलाई को ये व्रत रखा जाएगा।
हरियाली तीज की पूजा विधि:
हरियाली तीज के दिन महिलाएं विशेष रूप से सज-धज कर शिव-पार्वती की पूजा करती हैं। इस दिन व्रती महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं और झूला झूलती हैं।
पूजा विधि:
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
मिट्टी से शिव-पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा बनाएं या मूर्तिया रखें।
उन्हें रोली, चावल, फूल, बेलपत्र, धूप, दीप आदि से विधिपूर्वक पूजन करें।
हरियाली तीज के दिन सुहाग की सामग्री जैसे चूड़ी, बिंदी, मेहंदी, सिंदूर आदि माता पार्वती को अर्पित करें।
व्रत कथा सुनें या पढ़ें, यह कथा देवी पार्वती के तप और शिव विवाह की है।
दिन भर निराहार व्रत रखें और शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण करें।
हरियाली तीज का सांस्कृतिक महत्व:
हरियाली तीज न केवल धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सावन का महीना हरियाली, प्रेम और उत्सव का प्रतीक है। इस दिन महिलाएं झूले झूलती हैं, लोकगीत गाती हैं और पारंपरिक पोशाक में सजती हैं। कई जगहों पर इस दिन मेलों और झूला उत्सव का आयोजन भी होता है। राजस्थान और हरियाणा में यह पर्व बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। नवविवाहित महिलाएं अपने मायके जाती हैं और परिवार के साथ त्योहार का आनंद लेती हैं।
हरियाली तीज का आध्यात्मिक महत्व:
इस दिन देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। इसलिए यह व्रत वैवाहिक जीवन की सुख-शांति और अखंड सौभाग्य के लिए रखा जाता है।
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