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धर्म-अध्यात्म
Hanuman Janmotsav 2025: हनुमान जन्मोत्सव पर इस हनुमान अष्टक का पाठ जरूर करें, कष्टों से मिलेगी मुक्ति
Sarita
11 April 2025 9:27 AM IST

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Hanuman Janmotsav 2025: हनुमान जन्मोत्सव हर साल चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से उन श्रद्धालुओं के लिए महत्त्वपूर्ण होता है जो बजरंगबली को संकटों के विनाशक और साहस के प्रतीक रूप में पूजते हैं। इस वर्ष यह पर्व विशेष संयोग और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। भक्तजन मंदिरों में दर्शन के लिए उमड़ते हैं, व्रत रखते हैं और विशेष पाठ व आराधना करते हैं।
ऐसे में एक स्तुति जिसे विशेष मान्यता प्राप्त है, वह है हनुमान अष्टक। तुलसीदास जी द्वारा रचित यह पाठ न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि मानसिक दृढ़ता और नकारात्मकता से छुटकारा पाने का भी एक प्रभावशाली माध्यम माना जाता है। हनुमान जन्मोत्सव के अवसर पर इस अष्टक का पाठ करना श्रद्धालुओं के लिए फलदायक माना गया है। यहाँ पढ़ें सम्पूर्ण हनुमानाष्टक पाठ।
॥ हनुमानाष्टक ॥
बाल समय रवि भक्षी लियो तब,
तीनहुं लोक भयो अंधियारों ।
ताहि सों त्रास भयो जग को,
यह संकट काहु सों जात न टारो ।
देवन आनि करी बिनती तब,
छाड़ी दियो रवि कष्ट निवारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ ॥
बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि,
जात महाप्रभु पंथ निहारो ।
चौंकि महामुनि साप दियो तब,
चाहिए कौन बिचार बिचारो ।
कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु,
सो तुम दास के सोक निवारो ॥ ॥
अंगद के संग लेन गए सिय,
खोज कपीस यह बैन उचारो ।
बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो ।
हेरी थके तट सिन्धु सबै तब,
लाए सिया-सुधि प्राण उबारो ॥ ॥
रावण त्रास दई सिय को सब,
राक्षसी सों कही सोक निवारो ।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु,
जाए महा रजनीचर मारो ।
चाहत सीय असोक सों आगि सु,
दै प्रभुमुद्रिका सोक निवारो ॥ ॥
बान लग्यो उर लछिमन के तब,
प्राण तजे सुत रावन मारो ।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत,
तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो ।
आनि सजीवन हाथ दई तब,
लछिमन के तुम प्रान उबारो ॥ ॥
रावन युद्ध अजान कियो तब,
नाग कि फाँस सबै सिर डारो ।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल,
मोह भयो यह संकट भारो I
आनि खगेस तबै हनुमान जु,
बंधन काटि सुत्रास निवारो ॥ ॥
बंधु समेत जबै अहिरावन,
लै रघुनाथ पताल सिधारो ।
देबिहिं पूजि भलि विधि सों बलि,
देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो ।
जाय सहाय भयो तब ही,
अहिरावन सैन्य समेत संहारो ॥ ॥
काज किये बड़ देवन के तुम,
बीर महाप्रभु देखि बिचारो ।
कौन सो संकट मोर गरीब को,
जो तुमसे नहिं जात है टारो ।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु,
जो कछु संकट होय हमारो ॥ ॥
॥ दोहा ॥
लाल देह लाली लसे,
अरु धरि लाल लंगूर ।
वज्र देह दानव दलन,य जय जय कपि सूर ॥
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