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धर्म-अध्यात्म
Guru Purnima 2025: गुरु को गोविंद से भी ऊंचा दर्जा प्राप्त है,गुरु पूर्णिमा पर कबीर के अनमोल दोहों से जानें गुरु की महिमा
Sarita
10 July 2025 9:08 AM IST

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Guru Purnima 2025: आषाढ़ मास की पूर्णिमा अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है इसे गुरु पूर्णिमा के रूप में भी मनाया जाता है. सिख और बौद्ध धर्म में भी इस दिन को मनाया जाता है. गुरु को ईश्वर से भी बड़ा स्थान दिया गया है. हमारी सनातन संस्कृति में गुरु की महिमा का बखान ग्रंथों में, पुराणों में, शास्त्रों में सब में मिलता है|
आज 10 जुलाई गुरु पूर्णिमा के दिन हमें श्रद्धा भाव से अपने गुरु गुरुओं की पूजा करनी चाहिए. हमारा देश गुरु शिष्य परंपरा का देश है और सदियों से या ये कहे की युगों से गुरु को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया गया है. गुरु ही वह इंसान है जो सही राह दिखता है. कबीर ने अपने दोहों में गुरु की महिमा को बहुत अच्छे से पिरोया है. आईए जानते हैं कि उन्होंने गुरु के बारे में क्या शिक्षा दी है|
कबीर के अनमोल दोहे:
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय।।
कबीर दास जी गुरु की महत्ता बताते हुए कहते हैं गुरु के समान कोई भी हितैषी नहीं होता है. गुरु की कृपा मिल जाये तो आम आदमी भी पल भर में देवता बन जाता है|
गुरु गोबिंद तौ एक है, दूजा यहु आकार।
आपा मेट जीवत मरै, तौ पावै करतार।।
सद्गुरु कबीर कहते हैं कि गुरु और गोविंद दोनों ही एक हैं. इनका केवल आकार यानि उनकी उपाधि अलगअलग है. जो शिष्य अपने अहं को मिटाकर जीवित अवस्था में यानि शरीर के रहते ही विषयवासना की आसाक्ति छोड़ने के लिए खुद को क्षीण कर देता है, वही वास्तव में ईश्वर का साक्षात्कार कर सकता है|
सतगरु की महिमा अनंत, किया उपगार।
लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावणहार।।
कबीरदास जी कहते हैं कि गुरु की महिमा अपार है. गुरु के द्वारा किए गए उपकारों की कोई सीमा नहीं है. उसने मेरे अनंत ज्ञान चक्षु खोल दिए हैं और इस प्रकार वे मुझे लगातार परम ब्रह्म का साक्षात्कार कराते रहते हैं|
गुरु तो ऐसा चाहिए, शिष सों कछु न लेय।
शिष तो ऐसा चाहिए, गुरु को सब कुछ देय।।
कबीरदास जी कहते हैं कि गुरु को हमेशा निष्काम, निर्लोभी और संतोषी होना चाहिए. उसे शिष्य से कभी भी कुछ लेने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए क्योंकि जहां गुरु लोभी और शिष्य से कुछ लेने की कामना करता है, वहां पर गुरुत्व की गरिमा घट जाती है. लेकिन इससे परे शिष्य को हमेशा अपने आप को गुरु को सर्वस्व समर्पण करने के लिए तैयार रहना चाहिए, तभी उसे गुरु से ज्ञान की प्राप्ति हो सकेगी|
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