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धर्म-अध्यात्म
Ganpati :घर और मंदिर में क्यों रखी जाती हैं अलग-अलग तरह की प्रतिमाएं
Sarita
28 Aug 2025 12:51 PM IST

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Ganapati: विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता के रूप में पूजे जाने वाले भगवान गणेश की पूजा हर शुभ कार्य के आरंभ में की जाती है। उनकी मूर्तियों में उनकी सूंड की दिशा हमेशा से चर्चा का विषय रही है। क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ मूर्तियों में उनकी सूंड बाईं ओर और कुछ में दाईं ओर क्यों होती है? यह केवल एक बनावट का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व छिपा है।
गणेश जी को वक्रतुंड कहा गया है, अर्थात कहीं उनकी सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई पाई जाती है, तो कहीं दाईं ओर। दोनों ही रूपों का अलग-अलग धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। आइए जानते हैं कि घर और मंदिर में रखी गणेश मूर्तियों में सूंड की दिशा अलग-अलग क्यों होती है।
बाईं ओर सूंड वाले गणपति:
घर में पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ
परंपरा के अनुसार, घरों में बाईं ओर मुड़ी हुई सूंड वाली गणेश जी की मूर्ति रखना शुभ माना जाता है। इसका कारण यह है कि शरीर का बायाँ भाग हृदय और भावनाओं से जुड़ा होता है। यह जीवन की भौतिक और भावनात्मक वास्तविकताओं का प्रतिनिधित्व करता है।
सुख, शांति और सौम्यता का प्रतीक:
बाईं सूंड वाले गणपति शांत और सौम्य स्वभाव के माने जाते हैं। घर में इस मूर्ति की पूजा करने से परिवार में शांति, प्रेम और आपसी सद्भाव बना रहता है।
वैदिक परंपरा का प्रभाव:
यह मान्यता वैदिक परंपरा से जुड़ी है, जहाँ गणपति के इस रूप को परिवार में समृद्धि और स्थिरता का कारक माना जाता है।
दाईं सूंड वाले गणपति:
मंदिरों और तांत्रिक परंपराओं में पूजित
दाईं सूंड वाले गणपति की मूर्ति आमतौर पर मंदिरों में स्थापित की जाती है। शरीर का दाहिना भाग आध्यात्मिकता और ऊर्जा से जुड़ा माना जाता है। इसलिए, तांत्रिक परंपराओं में इस रूप का विशेष महत्व है।
क्रियाशीलता और शक्ति का प्रतीक:
यह रूप अत्यंत शक्तिशाली और जागृत माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति धन, समृद्धि और शक्ति की कामना करता है, उसे दाहिनी सूंड वाले गणपति की पूजा करनी चाहिए।
सावधानी की आवश्यकता:
शास्त्रों में कहा गया है कि इस रूप की पूजा केवल उचित विधि-विधान से ही करनी चाहिए। यही कारण है कि इसे सामान्य घरों की बजाय मंदिरों और विशेष पूजा स्थलों में स्थापित किया जाता है।
सूंड की दिशा का आध्यात्मिक संदेश:
गणेश जी की सूंड सदैव गतिशील रहती है, जो इस बात का संकेत है कि वे हर क्षण सक्रिय रहते हैं। यह हमें सिखाती है कि हमें जीवन में भी सदैव सक्रिय और जागृत रहना चाहिए।
बाईं सूंड: शांति, प्रेम, सौम्यता और पारिवारिक सुख का प्रतीक।
दाईं सूंड: शक्ति, आध्यात्मिकता, धन और विजय का प्रतीक।
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