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धर्म-अध्यात्म
Ganesh Chaturthi 2025 :जानिए शुभ कार्यों में सबसे पहले गणपति की पूजा क्यों की जाती है
Sarita
29 Aug 2025 8:57 AM IST

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Ganesh Chaturthi 2025 : देशभर में इस समय गणेशोत्सव की धूम है। लोग घरों पर गणपति की मूर्ति को स्थापित करते हुए उनकी पूजा-अर्चना कर रहे हैं। हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने में सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है। बिना गणेशजी जी पूजा करने से कार्यों में सफलता नहीं मिलती है। गणेश जी को विघ्नहर्ता, सिद्धिदाता, बुद्धिप्रदायक और प्रथम पूज्य कहा गया है। विवाह हो या गृह प्रवेश, नया व्यापार शुरू करना हो या किसी पूजा-अनुष्ठान की शुरुआत, सबसे पहले गणपति जी का आवाहन और पूजन किया जाता है। उनके बिना कोई भी धार्मिक कार्य आरंभ नहीं किया जाता। आइए जानते हैं आखिरकार सभी देवी-देवताओं में सबसे पहले भगवान गणेशी की पूजा क्यों की जाती है।
शुभ कार्यो में प्रथम पूजा क्यों ?
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार सभी देवताओं के बीच यह विवाद उत्पन्न हुआ कि कौन सबसे पहले पूजे जाने योग्य है। तब नारद मुनि ने सुझाव दिया कि जो देवता सबसे पहले पृथ्वी की तीन परिक्रमाएं कर लौटेगा, वह प्रथम पूज्य कहलाएगा। सभी देवता अपने-अपने वाहनों पर निकल पड़े। लेकिन गणेश जी ने अपनी सूझ-बूझ से माता-पिता की परिक्रमा कर ली और कहा कि मेरे लिए माता-पिता ही सृष्टि हैं। उनके इस विवेकपूर्ण उत्तर से प्रसन्न होकर सभी देवताओं और ऋषियों ने उन्हें ‘प्रथम पूज्य’ का दर्जा प्रदान किया।
गणेश पूजा का धार्मिक महत्व:
गणेश जी को संकटमोचक कहा गया है। वे कार्य में आने वाली सभी बाधाओं को दूर करते हैं। उनकी पूजा करने से नकारात्मकता दूर होती है, और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। उनके नाम का उच्चारण “ॐ गण गणपतये नमः” मन और मस्तिष्क को एकाग्र करता है। अतः जब कोई शुभ कार्य प्रारंभ किया जाता है, तो उसे निर्विघ्न संपन्न करने के लिए गणेश जी की पूजा की जाती है।
गणेश जी के प्रतीकात्मक रूप का रहस्य:
गणेश जी का बड़ा सिर बुद्धि और चिंतन का प्रतीक है, लंबा कान सुनने की क्षमता और ग्रहणशीलता का। उनकी छोटी आंखें एकाग्रता को दर्शाती हैं, जबकि उनका विशाल पेट धैर्य, सहनशीलता और सब कुछ आत्मसात करने की क्षमता का प्रतीक है। उनका वाहन मूषक हमारी चंचल और असंयमित इच्छाओं का प्रतीक है, जिस पर वे सवारी करते हैं जो दर्शाता है कि ज्ञान और संयम से ही इच्छाओं पर नियंत्रण संभव है। गणपति अक्सर वर मुद्रा में दिखाई देते हैं । वरमुद्रा सत्वगुण की प्रतीक है । इसी से वे भक्तोंकी मनोकामना पूरी कर अपने अभय हस्त से संपूर्ण भयों से भक्तों की रक्षा करते हैं।
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