धर्म-अध्यात्म

गणपति को क्यों चढ़ाते हैं मोदक और दूर्वा जानें विसर्जन की मान्यता

Ratna Netam
12 Sept 2026 2:21 PM IST
गणपति को क्यों चढ़ाते हैं मोदक और दूर्वा जानें विसर्जन की मान्यता
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धर्म : गणेश चतुर्थी का पर्व भगवान गणेश की पूजा, भक्ति और उत्साह का विशेष अवसर माना जाता है। देशभर में इस दिन गणपति बप्पा की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं, घरों और पंडालों को सजाया जाता है और विधि-विधान से पूजा की जाती है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य कहा गया है। यानी किसी भी शुभ कार्य, पूजा, अनुष्ठान या नई शुरुआत से पहले भगवान गणेश का स्मरण और पूजन किया जाता है।
गणेश चतुर्थी केवल पूजा-पाठ का त्योहार नहीं बल्कि इससे जुड़ी कई धार्मिक परंपराएं भी विशेष महत्व रखती हैं। भगवान गणेश को मोदक का भोग लगाया जाता है, दूर्वा अर्पित की जाती है और उत्सव के अंत में गणपति प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। इन सभी परंपराओं के पीछे अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं और प्रतीकात्मक अर्थ जुड़े हुए हैं।
क्यों सबसे पहले पूजे जाते हैं भगवान गणेश?
हिंदू धर्म में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश बाधाओं को दूर करने वाले और शुभता प्रदान करने वाले देवता हैं। इसलिए विवाह, गृह प्रवेश, नया व्यापार, धार्मिक अनुष्ठान या किसी अन्य महत्वपूर्ण कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से की जाती है।
एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार देवताओं के बीच यह प्रश्न उठा कि सबसे पहले किस देवता की पूजा की जानी चाहिए। इसके समाधान के लिए भगवान शिव ने कहा कि जो सबसे पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटेगा, उसे प्रथम पूज्य माना जाएगा।
इसके बाद सभी देवता अपने-अपने वाहनों पर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल पड़े। भगवान गणेश का वाहन मूषक था, इसलिए उन्होंने बुद्धि का प्रयोग किया। भगवान गणेश ने अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती की सात बार परिक्रमा की और कहा कि माता-पिता ही उनके लिए पूरा संसार हैं।
भगवान गणेश की बुद्धिमत्ता और माता-पिता के प्रति श्रद्धा से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्हें प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तभी से किसी भी शुभ कार्य से पहले भगवान गणेश की पूजा की परंपरा चली आ रही है।
गणेश चतुर्थी का क्या है महत्व?
गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।
इस दिन श्रद्धालु घरों और सार्वजनिक पंडालों में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करते हैं। गणपति की पूजा, आरती, मंत्र जाप और भोग लगाने के साथ उत्सव की शुरुआत होती है। कई स्थानों पर यह पर्व कई दिनों तक चलता है और अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति प्रतिमा के विसर्जन के साथ संपन्न होता है।
भक्त भगवान गणेश से सुख, समृद्धि, बुद्धि और जीवन की बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना करते हैं।
गणपति को क्यों प्रिय है मोदक?
गणेश पूजा में मोदक का विशेष स्थान है। भगवान गणेश को मोदक अत्यंत प्रिय माना जाता है। इसी कारण उन्हें कई जगह 'मोदकप्रिय' भी कहा जाता है।
धार्मिक मान्यताओं में मोदक को आनंद और ज्ञान का प्रतीक माना गया है। इसका बाहरी भाग साधारण होता है, जबकि अंदर मीठी भरावन होती है। इसे इस विचार से भी जोड़ा जाता है कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन उसका फल मधुर होता है।
गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को पारंपरिक रूप से 21 मोदक अर्पित करने की मान्यता भी प्रचलित है। महाराष्ट्र सहित देश के कई क्षेत्रों में उकडीचे मोदक खास तौर पर बनाए जाते हैं। इन्हें चावल के आटे से तैयार किया जाता है और अंदर नारियल तथा गुड़ की भरावन भरी जाती है।
आजकल चॉकलेट मोदक, ड्राई फ्रूट मोदक और कई अन्य प्रकार के मोदक भी बनाए जाते हैं, लेकिन पारंपरिक पूजा में घर पर बने मोदक का विशेष महत्व माना जाता है।
भगवान गणेश को क्यों चढ़ाई जाती है दूर्वा?
गणेश पूजा में दूर्वा यानी हरी घास अर्पित करने की परंपरा भी बहुत पुरानी है। दूर्वा को भगवान गणेश की प्रिय वस्तुओं में शामिल माना जाता है।
एक पौराणिक कथा के अनुसार अनलासुर नामक असुर के आतंक से देवता परेशान थे। भगवान गणेश ने उसे निगल लिया, लेकिन इसके बाद उनके शरीर में तेज गर्मी उत्पन्न हो गई। कई उपायों के बाद भी जब गर्मी शांत नहीं हुई तो ऋषियों ने भगवान गणेश के सिर पर दूर्वा रखी। मान्यता है कि इसके बाद उनके शरीर की गर्मी शांत हुई।
तभी से भगवान गणेश को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा जुड़ी मानी जाती है। पूजा में आमतौर पर दूर्वा की गांठ बनाकर गणपति को अर्पित की जाती है। कई धार्मिक परंपराओं में 21 दूर्वा चढ़ाने का विशेष महत्व बताया गया है।
दूर्वा को दीर्घायु, शांति और समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है।
गणपति को लाल फूल क्यों चढ़ाए जाते हैं?
भगवान गणेश की पूजा में लाल रंग को विशेष महत्व दिया जाता है। लाल फूल, विशेष रूप से गुड़हल, गणपति को अर्पित किया जाता है।
धार्मिक मान्यताओं में लाल रंग ऊर्जा, शक्ति और मंगल का प्रतीक माना जाता है। इसलिए गणेश पूजा में लाल वस्त्र और लाल फूल का प्रयोग शुभ माना जाता है।
हालांकि पूजा की परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में अलग हो सकती हैं। श्रद्धालु अपनी परंपरा और उपलब्धता के अनुसार फूल अर्पित करते हैं।
गणेश विसर्जन का क्या है अर्थ?
गणेश उत्सव का सबसे भावुक और महत्वपूर्ण हिस्सा गणपति विसर्जन होता है। प्रतिमा स्थापना के बाद भक्त अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार डेढ़ दिन, तीन दिन, पांच दिन, सात दिन या दस दिन बाद गणपति का विसर्जन करते हैं।
विसर्जन के दौरान श्रद्धालु 'गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ' के जयकारे लगाते हैं। धार्मिक रूप से विसर्जन जीवन के चक्र और अनित्यता का प्रतीक माना जाता है।
मिट्टी से बनी प्रतिमा को जल में विसर्जित करना इस विचार से भी जोड़ा जाता है कि जो तत्व प्रकृति से आया है, वह अंत में प्रकृति में ही विलीन हो जाता है। यह सृजन और विसर्जन के चक्र को दर्शाता है।
पर्यावरण के अनुकूल विसर्जन क्यों जरूरी?
पिछले कुछ वर्षों में इको-फ्रेंडली गणेश प्रतिमाओं का चलन तेजी से बढ़ा है। पारंपरिक मिट्टी की प्रतिमाएं पर्यावरण के लिए अपेक्षाकृत बेहतर मानी जाती हैं क्योंकि वे पानी में आसानी से घुल सकती हैं।
प्लास्टर ऑफ पेरिस और रासायनिक रंगों से बनी प्रतिमाओं से जल स्रोतों को नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है। इसलिए कई लोग घर में ही छोटे टब या कृत्रिम कुंड में प्रतिमा विसर्जन करते हैं।
पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाते हुए त्योहार मनाना धार्मिक आस्था और प्रकृति संरक्षण के बीच संतुलन बनाने का बेहतर तरीका हो सकता है।
गणेश पूजा में इन चीजों का भी है महत्व
गणेश चतुर्थी के अवसर पर सिंदूर, मोदक, दूर्वा, लाल फूल, नारियल और फल अर्पित किए जाते हैं। भगवान गणेश को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है।
पूजा के दौरान 'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का जाप किया जाता है। श्रद्धालु गणेश अथर्वशीर्ष और गणपति आरती का पाठ भी करते हैं।
मान्यता है कि श्रद्धा और विधि से की गई गणेश पूजा से घर में सकारात्मकता और सुख-समृद्धि आती है।
गणेश उत्सव देता है नई शुरुआत का संदेश
भगवान गणेश को बुद्धि, विवेक और नई शुरुआत का देवता माना जाता है। इसलिए गणेश चतुर्थी का संदेश केवल पूजा तक सीमित नहीं है। यह जीवन में आने वाली बाधाओं का धैर्य और समझदारी से सामना करने की प्रेरणा भी देता है।
मोदक आनंद और ज्ञान का प्रतीक है, दूर्वा शांति और सरलता का संदेश देती है, जबकि विसर्जन जीवन में परिवर्तन को स्वीकार करने की सीख देता है।
इसी वजह से गणेश चतुर्थी धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखती है। गणपति बप्पा की स्थापना से लेकर विसर्जन तक हर परंपरा श्रद्धा, प्रकृति, परिवार और समाज को एक सूत्र में जोड़ती दिखाई देती है।
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