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हरतालिका तीज पर भूलकर भी न छोड़ें ये 16 पत्रियां जानें पूजा सामग्री

nidhi
12 Sept 2026 11:28 AM IST
हरतालिका तीज पर भूलकर भी न छोड़ें ये 16 पत्रियां जानें पूजा सामग्री
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हरतालिका तीज
धर्म डेस्क: हरतालिका तीज हिंदू धर्म के प्रमुख व्रतों में से एक है। इस दिन महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा करती हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार व्रत में फल-फूल और सुहाग सामग्री के साथ अलग-अलग प्रकार के पत्ते यानी पत्रियां अर्पित करने का भी विशेष महत्व माना जाता है। कई क्षेत्रों की पूजा पद्धति में हरतालिका तीज पर 16 प्रकार की पत्रियां चढ़ाने की परंपरा है। इनमें देवदार, चंपा और कनेर सहित विभिन्न पौधों के पत्ते शामिल किए जाते हैं।
हालांकि पूजा सामग्री की सूची अलग-अलग क्षेत्रों, परिवारों और धार्मिक परंपराओं के अनुसार बदल सकती है। इसलिए स्थानीय पूजा पद्धति को मानने वाले श्रद्धालु अपने पुरोहित से सामग्री की सूची की पुष्टि कर सकते हैं।
16 प्रकार की पत्रियां चढ़ाने की परंपरा
हरतालिका तीज की पूजा में भगवान शिव और माता पार्वती को अलग-अलग पत्र अर्पित किए जाते हैं। प्रचलित पूजा पद्धतियों में बिल्वपत्र, शमी, धतूरा, आक, कनेर, चंपा, देवदार, तुलसी, आम और केले सहित विभिन्न वनस्पतियों के पत्तों का उल्लेख मिलता है। कुछ स्थानों पर अपामार्ग, बांस, अशोक और दूसरे पौधों की पत्रियां भी पूजा सामग्री में शामिल की जाती हैं।
सभी जगह एक जैसी 16 पत्रियों की सूची प्रचलित नहीं है। इसलिए उपलब्ध न होने पर किसी पौधे को तोड़ने या गलत वनस्पति इस्तेमाल करने के बजाय स्थानीय परंपरा के अनुसार पूजा करना बेहतर माना जाता है।
शिव-पार्वती की होती है विशेष पूजा
हरतालिका तीज के दिन महिलाएं सुबह स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है। कई जगह मिट्टी या बालू से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाने की परंपरा भी है।
भगवान शिव को बेलपत्र, फूल और अन्य पूजा सामग्री अर्पित की जाती है, जबकि माता पार्वती को श्रृंगार की वस्तुएं चढ़ाई जाती हैं। सुहागिन महिलाएं सिंदूर, चूड़ी, बिंदी, मेहंदी और वस्त्र जैसी सामग्री अर्पित कर अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।
माता पार्वती की तपस्या से जुड़ा है व्रत
पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी सखियां उन्हें वन में ले गई थीं, जहां उन्होंने शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की आराधना की।
माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। इसी कथा की स्मृति में हरतालिका तीज का व्रत रखने की परंपरा मानी जाती है।
पूजा में प्रकृति का भी विशेष स्थान
तीज की पूजा में फूल-पत्तियों के इस्तेमाल को प्रकृति से जुड़ाव के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र और धतूरे जैसी वनस्पतियों का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है।
हालांकि पूजा सामग्री जुटाते समय पर्यावरण का ध्यान रखना भी जरूरी है। दुर्लभ या संरक्षित पेड़-पौधों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। बाजार से सामग्री लेते समय भी सही वनस्पति की पहचान करना बेहतर है।
पूजा विधि में स्थानीय परंपरा को दें महत्व
हरतालिका तीज पर कई महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और रात में जागरण कर शिव-पार्वती की कथा सुनती हैं। अगले दिन पूजा के बाद व्रत का पारण किया जाता है। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर कठोर उपवास करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।
हरतालिका तीज की पूजा में 16 पत्रियों की परंपरा श्रद्धा और प्रकृति दोनों से जुड़ी मानी जाती है। लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों में सामग्री के नाम और संख्या में अंतर हो सकता है। इसलिए धार्मिक विधि को लेकर भ्रम होने पर अपने परिवार की परंपरा या स्थानीय पुरोहित की सलाह को प्राथमिकता देना बेहतर है।
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