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धर्म-अध्यात्म
dharm :आज सावन पुत्रदा एकादशी पर पढ़ें यह व्रत कथा, पूरी होंगी मनोकामनाएं
Sarita
5 Aug 2025 8:09 AM IST

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धर्म: सावन शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते हैं। यह एकादशी सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है। जो आज यानी 5 अगस्त को है। संतान सुख की कामना रखने वाले दंपत्तियों के लिए यह एकादशी बहुत फलदायी मानी जाती है। वहीं, एकादशी के दिन व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए यह बहुत सौभाग्यशाली मानी जाती है। आपको बता दें कि इस एकादशी के महत्व के बारे में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को बताया था। आइए आपको बताते हैं इसकी व्रत कथा के बारे में।
कथा क्या है:
एकादशी का महत्व सुनकर अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा- हे प्रभु, अब आप मुझे श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी की कथा सुनाने की कृपा करें। इसके बाद श्री कृष्ण ने कहा- हे धनुर्धर, श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी की कथा सुनने मात्र से अनंत यज्ञों के बराबर फल मिलता है। प्राचीन काल में महिष्मती नगरी पर राजा महीजित का शासन था। राजा बहुत ही धर्मपरायण, उदार और अपनी प्रजा का रक्षक था। उसकी प्रजा उससे बहुत प्रेम करती थी और राजा भी अपनी प्रजा का पालन-पोषण अपने पुत्रों के समान करता था। सब कुछ होते हुए भी, राजा महीजित अपनी निःसंतानता के कारण दुःखी था। निःसंतान होने के कारण उसे यह चिंता सता रही थी कि उसके बाद राज्य का उत्तराधिकारी कौन होगा। उसने संतान प्राप्ति के लिए अनेक उपाय किए, अनेक यज्ञ किए, दान-पुण्य किया, परन्तु कोई लाभ नहीं हुआ।
राजा ने अपनी समस्या के विषय में अपने राज्य के विद्वान ब्राह्मणों और महात्माओं से परामर्श किया। राजा की समस्या सुनकर सभी ब्राह्मण और महात्मा गहन विचार-विमर्श करने लगे। अंततः उन्होंने एक महान ऋषि, लोमश ऋषि के पास जाने का सुझाव दिया। लोमश ऋषि त्रिकालदर्शी थे और उन्हें भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञान था। राजा महीजित अपने मंत्रियों और कुछ ब्राह्मणों के साथ लोमश ऋषि के आश्रम पहुँचा। उसने श्रद्धापूर्वक ऋषि को प्रणाम किया और अपनी व्यथा सुनाई। राजा की समस्या सुनकर ऋषि ने अपनी दिव्य दृष्टि से उसके पूर्वजन्मों का दर्शन कर लिया।
ऋषि ने दर्शन करके कहा, "हे राजन! आप अपने पूर्वजन्म के कर्मों के कारण निःसंतान हैं। पूर्वजन्म में आप एक धनी वैश्य थे और आपने कभी किसी को कुछ नहीं दिया। एक बार आप प्यास से व्याकुल होकर एक जलाशय पर पहुँचे, जहाँ एक गाय अपने बछड़े के साथ जल पी रही थी। आपने उस प्यासी गाय और बछड़े को जल पीने से रोक दिया और स्वयं जल पी लिया। अपने इसी कर्म के कारण आपको निःसंतानता का कष्ट भोगना पड़ रहा है।"
यह सुनकर राजा बहुत दुःखी हुए और उन्होंने ऋषि से इस पाप के प्रायश्चित का उपाय पूछा। लोमश ऋषि बोले, "हे राजन! आप चिंता न करें। इसका एक उपाय है। आप और आपकी रानी, दोनों सावन मास के शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी का व्रत करें। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है और इसके प्रभाव से व्यक्ति को संतान की प्राप्ति होती है। आप सभी प्रजा से भी इस व्रत को करने का अनुरोध करें। यदि आप सभी मिलकर एकादशी का व्रत करें और उसका पुण्य मुझे अर्पित करें, तो आपको अवश्य ही संतान की प्राप्ति होगी।"
लोमश ऋषि की बात सुनकर राजा महीजित बहुत प्रसन्न हुए। वे अपनी राजधानी लौट आए और ऋषि की सलाह के अनुसार अपनी रानी के साथ विधि-विधान से पुत्रदा एकादशी का व्रत किया। उन्होंने अपनी समस्त प्रजा से भी इस व्रत को करने का अनुरोध किया। सभी ने मिलकर भक्तिभाव से इस व्रत का पालन किया। एकादशी के दिन राजा और प्रजा ने भगवान विष्णु की पूजा की, व्रत कथा सुनी और प्रभु का स्मरण करते हुए पूरी रात जागते रहे। द्वादशी के दिन व्रत रखा गया और लोमश ऋषि की सलाह के अनुसार सभी ने अपने व्रत का पुण्य राजा को समर्पित किया।
व्रत के प्रभाव और भगवान विष्णु की कृपा से कुछ समय बाद रानी गर्भवती हुई और उसने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। राजा महीजित और उनकी प्रजा प्रसन्नता से भर गए। राजा ने पुत्र का नाम सुकृत रखा और वह बड़ा होकर एक धर्मात्मा और प्रतापी राजा बना।
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