धर्म-अध्यात्म

साल में सिर्फ एक बार बंशी बजाते हैं बिहारी जी, दर्शन के लिए उमड़े भक्त

Rajeshwari Nishad
26 Oct 2026 6:50 PM IST
साल में सिर्फ एक बार बंशी बजाते हैं बिहारी जी, दर्शन के लिए उमड़े भक्त
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कोटा। राजस्थान के कोटा शहर के रंगबाड़ी स्थित ठाकुर बांके बिहारी मंदिर में शरद पूर्णिमा के अवसर पर भक्ति और आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिला। इस पावन अवसर पर ठाकुर जी का विशेष श्रृंगार किया गया। भगवान को श्वेत वस्त्र धारण कराए गए और साढ़े तीन किलो चांदी के आभूषणों से सजाया गया। मंदिर में ठाकुर जी के इस मनमोहक स्वरूप के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह रहा। इस मंदिर की खास परंपरा यह है कि साल में केवल शरद पूर्णिमा के दिन ही भक्तों को ठाकुर जी के इस विशेष श्वेत वस्त्र और चांदी के आभूषणों से सजे स्वरूप के दर्शन करने का अवसर मिलता है। यही वजह है कि इस दिन मंदिर में दर्शन का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है।
साल में एक दिन होते हैं विशेष स्वरूप के दर्शन
रंगबाड़ी स्थित ठाकुर बांके बिहारी मंदिर में शरद पूर्णिमा पर विशेष श्रृंगार की परंपरा वर्षों से श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। इस दिन भगवान को श्वेत वस्त्र पहनाए जाते हैं और चांदी के आभूषणों से सजाया जाता है।सामान्य दिनों में ठाकुर जी का श्रृंगार अलग तरीके से किया जाता है, लेकिन शरद पूर्णिमा पर उनका यह विशिष्ट स्वरूप भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र बनता है।मंदिर की इस परंपरा के कारण श्रद्धालु पूरे साल इस दिन का इंतजार करते हैं। भक्त भगवान के दर्शन कर सुख-समृद्धि, परिवार की खुशहाली और जीवन में शांति की कामना करते हैं।
साढ़े तीन किलो चांदी के आभूषणों से किया गया श्रृंगार
कोटा के रंगबाड़ी स्थित ठाकुर बांके बिहारी मंदिर में शरद पूर्णिमा पर ठाकुर जी का विशेष श्रृंगार आकर्षण का केंद्र रहा। भगवान को श्वेत वस्त्र धारण कराए गए और साढ़े तीन किलो चांदी के आभूषणों से सजाया गया।चांदी के आभूषणों से सुसज्जित ठाकुर जी का स्वरूप देखकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की गई और भक्तों ने भगवान के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना की।इस प्रकार का विशेष श्रृंगार मंदिर की परंपरा का हिस्सा है, जिसके कारण शरद पूर्णिमा का पर्व यहां भक्तों के लिए खास महत्व रखता है।
शरद पूर्णिमा पर श्वेत वस्त्र पहनाने की क्या है मान्यता?
हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी चांदनी को शुभ माना जाता है।भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला को भी शरद पूर्णिमा से जोड़ा जाता है। इसी कारण कई कृष्ण मंदिरों में इस दिन भगवान का श्वेत वस्त्रों से श्रृंगार किया जाता है।सफेद रंग को शांति, पवित्रता और शीतलता का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर मंदिरों में विशेष पूजा, भजन-कीर्तन और भोग अर्पण की परंपरा निभाई जाती है।
भगवान बांके बिहारी की पूजा का महत्व
भगवान बांके बिहारी को श्रीकृष्ण का स्वरूप माना जाता है। भक्त उन्हें प्रेम, भक्ति और आनंद का प्रतीक मानकर उनकी आराधना करते हैं।शरद पूर्णिमा पर विशेष श्रृंगार और पूजा के माध्यम से भक्त भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का स्मरण करते हैं।इस दिन कई मंदिरों में खीर और अन्य श्वेत मिठाइयों का भोग लगाया जाता है। पूजा के बाद प्रसाद श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भक्त इस दिन भगवान से परिवार की खुशहाली, सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।
मंदिर में उमड़ी श्रद्धालुओं की आस्था
शरद पूर्णिमा पर ठाकुर बांके बिहारी के विशेष स्वरूप के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं में उत्साह देखा गया। भक्तों ने भगवान के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।मंदिरों में ऐसे विशेष आयोजन स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।कोटा का रंगबाड़ी स्थित बांके बिहारी मंदिर भी कृष्ण भक्तों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां जन्माष्टमी, शरद पूर्णिमा और अन्य प्रमुख त्योहारों पर विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं।
शरद पूर्णिमा का धार्मिक और सांस्कृतिक संदेश
शरद पूर्णिमा केवल पूजा-अर्चना का पर्व नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति में प्रकृति, चंद्रमा और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति से भी जुड़ा हुआ है।इस दिन श्रद्धालु चंद्रमा के दर्शन करते हैं, दीप जलाते हैं और धार्मिक परंपराओं के अनुसार पूजा करते हैं।कोटा के बांके बिहारी मंदिर में ठाकुर जी का श्वेत वस्त्रों और चांदी के आभूषणों से किया गया विशेष श्रृंगार इसी धार्मिक आस्था का सुंदर उदाहरण है।
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