धर्म-अध्यात्म

51 शक्तिपीठों में ये 5 मंदिर हैं बेहद खास

Rajeshwari Nishad
15 Oct 2026 8:28 PM IST
51 शक्तिपीठों में ये 5 मंदिर हैं बेहद खास
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धर्म। हिंदू धर्म में मां दुर्गा और आदिशक्ति की उपासना का विशेष महत्व है। देशभर में देवी के अनेक प्रसिद्ध मंदिर हैं, लेकिन शक्तिपीठों का स्थान अत्यंत पवित्र माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता सती के शरीर के अंग और आभूषण जिन स्थानों पर गिरे थे, वे स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुए। इन मंदिरों में मां आदिशक्ति के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि और अन्य धार्मिक अवसरों पर लाखों श्रद्धालु इन पवित्र स्थानों पर दर्शन करने पहुंचते हैं। भारत में असम का कामाख्या मंदिर, पश्चिम बंगाल का कालीघाट, हिमाचल प्रदेश का ज्वाला देवी मंदिर, नैना देवी मंदिर और उत्तर प्रदेश का विशालाक्षी मंदिर प्रमुख शक्तिपीठों में शामिल हैं। आइए जानते हैं इन पांच प्रसिद्ध शक्तिपीठों से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं और विशेषताओं के बारे में।

माता सती और शक्तिपीठों की पौराणिक कथा
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता सती राजा दक्ष की पुत्री और भगवान शिव की पत्नी थीं। राजा दक्ष भगवान शिव से नाराज रहते थे।एक बार राजा दक्ष ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने अनेक देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन भगवान शिव और माता सती को निमंत्रण नहीं दिया।इसके बावजूद माता सती अपने पिता के यज्ञ में पहुंचीं। वहां भगवान शिव का अपमान होने से वह अत्यंत दुखी हुईं और उन्होंने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए।
जब भगवान शिव को इस घटना की जानकारी मिली, तो वह माता सती के शरीर को लेकर तीनों लोकों में विचरण करने लगे।मान्यता है कि सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को अलग-अलग भागों में विभाजित किया।उनके अंग और आभूषण जहां-जहां गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए।धार्मिक परंपराओं में शक्तिपीठों की संख्या सामान्यतः 51 बताई जाती है, हालांकि कुछ ग्रंथों में इनकी संख्या अलग भी मिलती है।
कामाख्या शक्तिपीठ, असम
असम के गुवाहाटी शहर में नीलाचल पर्वत पर स्थित मां कामाख्या मंदिर भारत के सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है।पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसी स्थान पर माता सती का योनि भाग गिरा था। इसलिए इस मंदिर को सृजन शक्ति और मातृत्व का प्रतीक माना जाता है।
इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां देवी की पारंपरिक प्रतिमा के बजाय प्राकृतिक शिलारूप में पूजा की जाती है।कामाख्या मंदिर तांत्रिक साधना और शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र भी है।यहां हर वर्ष अंबुबाची मेले का आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या में साधु-संत और श्रद्धालु शामिल होते हैं।मान्यता है कि मां कामाख्या की आराधना से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
कालीघाट शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में स्थित कालीघाट मंदिर मां काली की उपासना का प्रसिद्ध केंद्र है।धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां माता सती के दाहिने पैर की उंगलियां गिरी थीं।इस मंदिर में देवी के काली स्वरूप की पूजा होती है। मां काली को बुराई के विनाश और भक्तों की रक्षा करने वाली शक्ति के रूप में माना जाता है।
कालीघाट मंदिर में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं।विशेष रूप से काली पूजा, दीपावली और नवरात्रि के अवसर पर यहां भक्तों की भीड़ बढ़ जाती है।बंगाल की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में इस मंदिर का विशेष स्थान है।
ज्वाला देवी शक्तिपीठ, हिमाचल प्रदेश
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित ज्वाला देवी मंदिर अपनी अनोखी धार्मिक परंपरा के लिए प्रसिद्ध है।पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस स्थान पर माता सती की जिह्वा यानी जीभ गिरी थी।
मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां प्राकृतिक रूप से प्रज्वलित होने वाली ज्वालाएं हैं। श्रद्धालु इन ज्वालाओं को मां ज्वाला देवी का दिव्य स्वरूप मानकर पूजा करते हैं।यहां देवी की पारंपरिक मूर्ति की जगह पवित्र ज्वालाओं की आराधना की जाती है।चैत्र और शारदीय नवरात्रि में मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु यहां माता के दर्शन करने पहुंचते हैं।
नैना देवी शक्तिपीठ, हिमाचल प्रदेश
हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में स्थित श्री नैना देवी मंदिर भी प्रसिद्ध शक्तिपीठों में शामिल है।धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस स्थान पर माता सती के नेत्र गिरे थे। इसी कारण देवी का नाम नैना देवी पड़ा।ऊंची पहाड़ियों के बीच स्थित यह मंदिर अपनी प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है।
श्रद्धालु यहां माता के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि और कल्याण की प्रार्थना करते हैं।नवरात्रि के समय मंदिर में विशेष पूजा और धार्मिक आयोजन होते हैं। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए आते हैं।मंदिर तक पहुंचने के लिए पैदल मार्ग के साथ रोपवे की सुविधा भी उपलब्ध है।
विशालाक्षी शक्तिपीठ, उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में स्थित विशालाक्षी देवी मंदिर भी शक्तिपीठ परंपरा का महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है।यह मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर और मणिकर्णिका घाट के आसपास के धार्मिक क्षेत्र में स्थित है।पौराणिक मान्यताओं के विभिन्न संस्करणों में यहां माता सती की कर्णमणि यानी कान का आभूषण गिरने की बात कही जाती है।मां विशालाक्षी को देवी पार्वती का स्वरूप माना जाता है।
काशी आने वाले अनेक श्रद्धालु भगवान विश्वनाथ के दर्शन के साथ मां विशालाक्षी की आराधना भी करते हैं।मान्यता है कि माता के दर्शन से भक्तों को आध्यात्मिक शांति और आशीर्वाद प्राप्त होता है।नवरात्रि में क्यों बढ़ जाता है शक्तिपीठों का महत्व?
हिंदू धर्म में नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा के लिए समर्पित होते हैं।इन दिनों भक्त व्रत रखते हैं, देवी के मंत्रों का जाप करते हैं और मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।
शक्तिपीठों में नवरात्रि का विशेष धार्मिक महत्व है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इन पवित्र स्थानों पर माता की आराधना करने से जीवन में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।कई श्रद्धालु नवरात्रि के दौरान शक्तिपीठों की यात्रा का संकल्प भी लेते हैं।
शक्तिपीठों से जुड़ी मान्यताओं का धार्मिक महत्व
शक्तिपीठ केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं के महत्वपूर्ण केंद्र भी हैं।इन मंदिरों की पूजा-पद्धति, वास्तुकला और स्थानीय परंपराएं एक-दूसरे से अलग हैं, लेकिन सभी स्थानों पर देवी शक्ति की आराधना की जाती है।माता सती की पौराणिक कथा भगवान शिव और आदिशक्ति के संबंध तथा शक्ति उपासना के महत्व को दर्शाती है।
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