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धर्म-अध्यात्म

एक ऐसा मंदिर जहां पीरियड्स को माना जाता है पवित्र, प्रसाद के तौर पर लाल पानी

Ritu Yadav
24 Feb 2021 6:53 AM GMT
एक ऐसा मंदिर जहां पीरियड्स को माना जाता है पवित्र, प्रसाद के तौर पर लाल पानी
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मासिक धर्म जिसे सामान्य भाषा में पीरियड्स कहा जाता है, उसके बारे में हमारे समाज में खुलकर बात करना भी ठीक नहीं समझा जाता.

जनता से रिश्ता बेवङेस्क | मासिक धर्म जिसे सामान्य भाषा में पीरियड्स कहा जाता है, उसके बारे में हमारे समाज में खुलकर बात करना भी ठीक नहीं समझा जाता. मासिक धर्म को लेकर तमाम जगहों पर महिलाओं पर तरह-तरह की पाबंदियां लगाई जाती हैं. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि हमारे देश में एक मंदिर ऐसा है जहां उन्हीं पीरियड्स को बहुत पवित्र समझा जाता है.

हम बात कर रहे हैं कामाख्या देवी के मंदिर की. ये मंदिर असम की राजधानी दिसपुर से करीब 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नीलांचल पर्वत पर है और 51 शक्तिपीठों में से एक है. मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सती का गर्भ और योनि गिरी थी. इस वजह से यहां मातारानी को तीन दिनों तक पीरियड्स होते हैं और उन दिनों में मंदिर की शक्ति कहीं ज्यादा बढ़ जाती है.

नदी हो जाती है लाल

हर साल जून महीने के दौरान देवी अपने मासिक चक्र में होती हैं. इस दौरान यहां मौजूद ब्रह्मपुत्र नदी का पानी लाल रंग का हो जाता है. इस दौरान तीन दिनों तक मंदिर बंद रहता है. लेकिन नदी के लाल लाल जल को भक्तों के बीच प्रसाद के तौर पर बांटा जाता है.

सफेद कपड़ा भी हो जाता है लाल

कहा जाता है कि जब मातारानी को पीरियड्स होने वाले होते हैं तो मंदिर में एक सफेद रंग का कपड़ा बिछा दिया जाता है. तीन दिन बाद जब मंदिर के द्वार खोले जाते हैं तो ये कपड़ा लाल रंग का होता है. इस कपड़े को अम्बुवाची वस्त्र कहते हैं. इसे भी भक्तों के बीच प्रसाद के तौर पर बांटा जाता है.

ये भी कहा जाता है

हालांकि कुछ लोगों का कहना ये भी है कि इस समय नदी में मंदिर के पुजारी सिंदूर डाल देते हैं, जिससे यहां का पानी लाल हो जाता है. पानी के लाल रंग की सच्चाई क्या है, इसकी हम पुष्टि नहीं करते, लेकिन लोग उस पानी को माता के मासिक धर्म का पानी समझकर ही ग्रहण करते हैं. ऐसे में सोचने वाली बात ये है कि जिस चीज को एक मंदिर में इतना पवित्र माना जाता है, वो समाज में अपवित्र क्यों समझी जाती है.

ये है 51 शक्तिपीठ की कहानी

एक बार देवी सती के पिता दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया. उस यज्ञ में उन्होंने सबको बुलाया लेकिन सती को नहीं बुलाया. शिव जी के बार-बार मना करने के बावजूद सती बिना बुलाए उस यज्ञ में अकेले ही शामिल होने चली गईं. वहां दक्ष ने शिव जी का बहुत अपमान किया जिसे वे बर्दाश्त नहीं कर पाईं और यज्ञ कुंड में कूदकर उन्होंने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली.

जब ये बात शिव जी को पता चली तो उन्हें बहुत क्रोध आया और उन्होंने यज्ञ से सती के मृत शरीर को निकालकर अपने कंधे पर रखा और अपना विकराल रूप लेते हुए तांडव शुरू कर दिया. भगवान शंकर के क्रोध को शांत करने के लिए विष्णु जी ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी का शरीर कई टुकड़ों में बांट दिया. वो टुकड़े जिन स्थानों पर गिरे, उन स्थानों को शक्तिपीठ कहा जाता है. माना जाता है कि कामाख्या माता के मंदिर में देवी सती का गर्भ और योनि गिरा था.

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