धर्म-अध्यात्म

12वां ज्योतिर्लिंग घृष्णेश्वर जानें महादेव के इस प्राचीन मंदिर की अद्भुत कथा

nidhi
24 Aug 2026 8:26 AM IST
12वां ज्योतिर्लिंग घृष्णेश्वर जानें महादेव के इस प्राचीन मंदिर की अद्भुत कथा
x
श्वर ज्योतिर्लिंग की क्या है
धर्म: भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग को बारहवां और अंतिम ज्योतिर्लिंग माना जाता है। महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर जिले के वेरुल गांव में स्थित यह मंदिर प्रसिद्ध एलोरा गुफाओं के बेहद करीब है। धार्मिक आस्था के साथ अपनी प्राचीन वास्तुकला और पौराणिक कथाओं के कारण भी घृष्णेश्वर मंदिर देशभर के श्रद्धालुओं के बीच विशेष स्थान रखता है। महाराष्ट्र पर्यटन विभाग भी इसे भगवान शिव के 12वें और अंतिम ज्योतिर्लिंग के रूप में वर्णित करता है।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा भगवान शिव की परम भक्त घुष्मा से संबंधित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सुधर्मा नाम के एक ब्राह्मण और उनकी पत्नी सुदेहा की कोई संतान नहीं थी। संतान की इच्छा के कारण सुदेहा ने अपने पति का विवाह अपनी बहन घुष्मा से करा दिया।
घुष्मा भगवान शिव की अनन्य भक्त थीं। मान्यता है कि वह प्रतिदिन 101 पार्थिव शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा करतीं और पूजा के बाद उन्हें एक जलाशय में विसर्जित करती थीं। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव की कृपा से उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई।
समय बीतने के साथ सुदेहा के मन में अपनी बहन और उसके पुत्र के प्रति ईर्ष्या पैदा हो गई। पौराणिक कथा के अनुसार इसी ईर्ष्या में उसने घुष्मा के पुत्र की हत्या कर शव उसी जलाशय में डाल दिया, जहां घुष्मा प्रतिदिन शिवलिंग विसर्जित करती थीं।
पुत्र की हत्या की जानकारी मिलने के बावजूद घुष्मा ने भगवान शिव पर अपना विश्वास नहीं छोड़ा। वह रोज की तरह शिव आराधना में लगी रहीं और शिवलिंगों का विसर्जन करने जलाशय पहुंचीं। कथा के अनुसार उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उनके पुत्र को जीवित कर दिया।
भगवान शिव सुदेहा को दंड देना चाहते थे, लेकिन घुष्मा ने उनसे अपनी बहन को क्षमा करने की प्रार्थना की। उनकी भक्ति और क्षमाशीलता से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसी स्थान पर हमेशा के लिए विराजमान होने का वरदान दिया। मान्यता है कि भक्त घुष्मा के नाम पर यह ज्योतिर्लिंग घुष्मेश्वर कहलाया, जो बाद में घृष्णेश्वर नाम से प्रसिद्ध हुआ।
सदियों पुराना है मंदिर का इतिहास
घृष्णेश्वर मंदिर का उल्लेख शिव पुराण सहित प्राचीन धार्मिक साहित्य में मिलता है। सरकारी पर्यटन स्रोतों के अनुसार इस स्थल की पुरातात्विक प्राचीनता 11वीं-12वीं शताब्दी तक जाती है। मंदिर ने अपने लंबे इतिहास में कई उतार-चढ़ाव और पुनर्निर्माण देखे।
महाराष्ट्र पर्यटन विभाग के अनुसार 16वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी महाराज के दादा मालोजी भोसले ने मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। बाद में 18वीं शताब्दी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने मंदिर का पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार कराया। वर्तमान मंदिर की भव्यता में अहिल्याबाई होलकर के योगदान को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
लाल पत्थरों से बना भव्य मंदिर
घृष्णेश्वर मंदिर अपनी शानदार स्थापत्य कला के लिए भी प्रसिद्ध है। इसका निर्माण लाल पत्थरों से किया गया है। मंदिर के पांच स्तर वाले शिखर पर देवी-देवताओं और विभिन्न पौराणिक प्रसंगों से संबंधित सुंदर आकृतियां देखने को मिलती हैं।
मंदिर का विशाल सभा मंडप 24 स्तंभों पर टिका हुआ है। इन स्तंभों पर भगवान शिव से जुड़ी कथाओं और अन्य धार्मिक आकृतियों की खूबसूरत नक्काशी की गई है। गर्भगृह में घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग विराजमान है और सभा मंडप में भगवान शिव के वाहन नंदी की प्रतिमा भी स्थापित है।
एलोरा गुफाओं के बेहद करीब
घृष्णेश्वर मंदिर की एक और खासियत इसकी भौगोलिक स्थिति है। विश्व प्रसिद्ध एलोरा की गुफाएं मंदिर के बहुत करीब स्थित हैं। इसलिए यहां आने वाले श्रद्धालु ज्योतिर्लिंग के दर्शन के साथ प्राचीन भारतीय कला और स्थापत्य की अद्भुत विरासत को भी देख सकते हैं।
महाशिवरात्रि पर उमड़ती है भारी भीड़
वैसे तो सालभर श्रद्धालु घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने पहुंचते हैं, लेकिन सावन और महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां विशेष धार्मिक माहौल रहता है। मंदिर में रुद्राभिषेक, पंचामृत पूजन और महामृत्युंजय जाप जैसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर विशेष पूजा और रात्रि जागरण के साथ बड़ी संख्या में शिवभक्त मंदिर पहुंचते हैं।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा का मूल संदेश अटूट भक्ति, धैर्य और क्षमा से जुड़ा है। भक्त घुष्मा की भगवान शिव के प्रति अडिग आस्था की कथा के कारण यह ज्योतिर्लिंग शिवभक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। इतिहास, धर्म और शानदार स्थापत्य का संगम घृष्णेश्वर को भारत के प्रमुख शिव तीर्थों में एक विशिष्ट स्थान देता है।
Next Story