सम्पादकीय

ओबीसी बिल के संकेत

Subhi
12 Aug 2021 3:01 AM GMT
ओबीसी बिल के संकेत
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लोकसभा ने ओबीसी लिस्ट बनाने के राज्यों के अधिकार से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को जिस तरह से पारित किया, वह काफी कुछ कहता है।

लोकसभा ने ओबीसी लिस्ट बनाने के राज्यों के अधिकार से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को जिस तरह से पारित किया, वह काफी कुछ कहता है। पूरे मॉनसून सत्र के दौरान देखा गया विपक्ष का हंगामा, शोर-शराबा और विरोध कुछ समय के लिए थम गया। इस बिल की खातिर विपक्ष ने अपना विरोध स्थगित कर दिया। सत्ता पक्ष और विपक्ष की असाधारण एकजुटता के बीच यह संशोधन विधेयक 385 बनाम शून्य मतों से पारित हो गया। अब इसे राज्यसभा में पेश किया जाना है और पूरी संभावना है कि वहां भी यह ऐसी ही आसानी से पारित हो जाएगा। इस बिल की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 5 मई को दिए अपने एक फैसले में कहा कि 102वें संविधान संशोधन के बाद राज्यों को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े समुदायों की अपनी सूची तैयार करने का अधिकार नहीं है। यानी राज्य सरकारें अपने स्तर पर किसी खास समुदाय को आरक्षण के दायरे में नहीं ला सकतीं। यह अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार के पास है। स्वाभाविक रूप से राज्य सरकारों ने इसे अपने अधिकारों में कटौती के रूप में लिया और विपक्षी दल केंद्र पर निशाना साधने लगे। मगर इस संशोधन विधेयक पर सत्ता पक्ष और विपक्ष में जो रजामंदी दिख रही है उसके पीछे संविधान के संघात्मक ढांचे के साथ छेड़छाड़ करने के आरोपों से ज्यादा ओबीसी समुदायों के मजबूत वोट बैंक की भूमिका है।

कोई भी पार्टी इस वोट बैंक को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से यह संदेश नहीं जाने देना चाहती कि वह उसके हितों की चिंता करने के मामले में औरों से पीछे है। यही वजह है कि केंद्र सरकार फटाफट बिल ले आई और विपक्ष ने भी पेगासस से लेकर कृषि कानूनों तक पर चल रही अपनी आरपार की लड़ाई को कुछ समय के लिए भुला देने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई। बिल पर सदन में हुई बहस में भी जो दो मुद्दे प्रमुखता से उठे वे थे- जाति आधारित जनगणना और आरक्षण पर लगी अधिकतम 50 फीसदी की सीमा को समाप्त करने की जरूरत। दोनों ही मसलों पर सरकार का सकारात्मक रुख रहा। 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण के संबंध में हालांकि उसने कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए सावधानी की जरूरत बताई, लेकिन यह कहना नहीं भूली कि वह इस मसले पर सांसदों की भावना समझती है। जातिवार जनगणना को लेकर भी संकेत हैं कि 2021 में नियमित जनगणना का काम पूरा होने के बाद इसका काम शुरू करवाया जा सकता है। संसदीय राजनीति के सभी धड़ों में ऐसी व्यापक सहमति बताती है कि बहुत संभव है, हम जल्दी ही एक बार फिर देश में आरक्षण को सभी रोगों की दवा बताने वाली राजनीति हावी होते देखें। एक समाज के रूप में इस दौर का भी सर्वश्रेष्ठ हमें मिले, इसके लिए राजनीति को थोड़ा और क्रिएटिव, थोड़ा और कल्पनाशील बनना होगा।

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