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हूती की धमकी से क्यों डर रही दुनिया, जानें बाब-अल-मंदेब का महत्व

Saba Naaz
21 July 2026 6:46 PM IST
हूती की धमकी से क्यों डर रही दुनिया, जानें बाब-अल-मंदेब का महत्व
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नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत समेत पूरी दुनिया के लिए ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चुनौती खड़ी हो गई है। यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ नौसैनिक नाकेबंदी की घोषणा कर दी है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार पहले ही होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुई अस्थिरता से जूझ रहा है। अगर लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य में भी किसी तरह की बड़ी रुकावट आती है, तो इसका सीधा असर तेल और गैस की आपूर्ति पर पड़ सकता है।

मार्च 2026 में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में सप्लाई बाधित होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला था। भारत ने उस समय अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई और वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था के जरिए स्थिति संभालने की कोशिश की। हालांकि, भारत की बड़ी ऊर्जा जरूरतें अब भी मध्य पूर्व के देशों से पूरी होती हैं, इसलिए क्षेत्र में किसी भी नए संकट का असर भारत पर पड़ सकता है।

हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ यह कदम यमन की राजधानी और अन्य इलाकों की कथित घेराबंदी के जवाब में उठाया है। हूतियों का कहना है कि यह कार्रवाई सऊदी अरब की नीतियों के विरोध में की जा रही है। इससे लाल सागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। इससे पहले भी हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में कई वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाया था, जिसके बाद कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने जहाजों का मार्ग बदल दिया था।

बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य की अहमियत को देखते हुए इस संकट का प्रभाव और बढ़ सकता है। यह समुद्री मार्ग लाल सागर को हिंद महासागर से जोड़ता है और स्वेज नहर के रास्ते यूरोप और एशिया के बीच व्यापार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यमन के पूर्व और जिबूती तथा इरिट्रिया के पश्चिम में स्थित यह जलडमरूमध्य वैश्विक व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

दुनिया के बड़े हिस्से का तेल, गैस, अनाज और अन्य जरूरी सामान इसी समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। पहले इस मार्ग से वैश्विक समुद्री व्यापार का करीब 15 प्रतिशत हिस्सा संचालित होता था। हालांकि, वर्ष 2023 के बाद हूती हमलों के कारण कई जहाजों ने इस रास्ते से दूरी बनानी शुरू कर दी और उन्हें अफ्रीका के लंबे समुद्री मार्ग से होकर जाना पड़ा।

होर्मुज जलडमरूमध्य में परेशानी के बाद सऊदी अरब ने अपने तेल निर्यात के लिए लाल सागर स्थित यानबू बंदरगाह का इस्तेमाल बढ़ाया था। यहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल भेजा जा रहा था, लेकिन बाब-अल-मंदेब क्षेत्र में बढ़ते खतरे के कारण यह रास्ता भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा रहा है।

भारत के लिए सऊदी अरब एक प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता देशों में शामिल है। ऐसे में अगर सऊदी तेल निर्यात प्रभावित होता है तो भारत की कच्चे तेल की खरीद पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से मिलने वाला कच्चा तेल भारत के लिए एक बड़ा सहारा बना रहेगा।

सरकार लगातार ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए रणनीतिक तेल भंडार, वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों और अलग-अलग देशों से आयात बढ़ाने जैसे कदम उठा रही है। लेकिन अगर पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों, परिवहन लागत और आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है।

बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य केवल एक समुद्री रास्ता नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की महत्वपूर्ण कड़ी है। यही वजह है कि हूती विद्रोहियों की इस घोषणा ने दुनिया के साथ भारत की चिंता भी बढ़ा दी है। आने वाले दिनों में इस क्षेत्र की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।

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